संपादकीय : आतंक पर दोहरा रवैया
बिश्केक में पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग की मौजूदगी में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि आतंक को रणनीतिक साधन नहीं बनाया जा सकता, यह एक बेहद सशक्त कूटनीतिक वक्तव्य है। मोदी ने आतंकवाद के पूरे पारिस्थितिकी तंत्र- वित्तपोषण, भर्ती, कट्टरपंथ, सुरक्षित पनाहगाह और तकनीकी साधन मुहैया कराने तथा आतंकवाद पर दोहरे मानदंड अपनाने वालों को एक झटके में उजागर कर दिया।
बिश्केक घोषणा में आतंकवाद, अलगाववाद और उग्रवाद के लिए आतंकवादी संगठनों के इस्तेमाल का विरोध और सुरक्षा सहयोग मजबूत करने की बात शामिल होना भारतीय कूटनीति की बड़ी उपलब्धि है, हालांकि इसकी असली परीक्षा इस बात से होगी कि सदस्य देश अपने यहां मौजूद आतंकवादी नेटवर्क और उनके वित्तीय संरक्षकों के खिलाफ कितना ठोस कदम उठाते हैं। शंघाई सहयोग संगठन की स्थिति इस चुनौती को स्पष्ट करती है। रूस ने मध्य एशिया और अफगानिस्तान से निकलने वाले आतंकवाद के विरुद्ध महत्वपूर्ण सुरक्षा सहयोग दिया, लेकिन अब तालिबान के साथ उसका बढ़ता संपर्क नई जटिलता पैदा करता है। चीन उइगर उग्रवाद और मध्य एशिया की अस्थिरता के प्रति अत्यंत सतर्क है, पर पाकिस्तान के साथ उसके रणनीतिक संबंध आतंकवाद पर एकसमान नीति को कठिन बनाते हैं।
ईरान आईएस और अन्य सुन्नी जिहादी संगठनों का विरोध करता है, किंतु स्वयं पश्चिम और कुछ क्षेत्रीय शक्तियों द्वारा आतंकवाद समर्थक माना जाता है। पाकिस्तान आतंकवाद से अपने नुकसान का हवाला देता है और एससीओ की अध्यक्षता करता है, लेकिन उसके भूभाग से भारत-विरोधी आतंकवादी ढांचे संचालित होते हैं। जाहिर है कि यही शंघाई सहयोग संगठन के देशों की सबसे बड़ी कमजोरी है। आतंकवाद पर बाहरी सहमति तो है, पर आतंकवाद की परिभाषा और राज्य-प्रायोजन पर एकमत नहीं। भारत इसी कथनी करनी के अंतर को पाटने की कोशिश कर रहा है।
भारत ने पिछले दशक में आतंक से जंग को सैन्य कार्रवाई और कूटनीति दोनों को जोड़ा है- 2016 की सर्जिकल स्ट्राइक, 2019 का बालाकोट, 2025 का ऑपरेशन सिंदूर, आतंक वित्तपोषण पर दबाव, संयुक्त राष्ट्र में मसूद अजहर का वैश्विक आतंकी पदनाम, 26/11 आरोपी तहव्वुर राणा का प्रत्यर्पण और अनेक देशों के साथ आतंकवाद-रोधी कार्यसमूह इसके कुछ प्रमाण हैं। सरकार के अनुसार उसकी कोशिशों से जम्मू-कश्मीर में आतंकवादी घटनाएं बहुत तेजी से घटी हैं। वैश्विक स्तर पर देखें तो सैन्य कार्रवाई आतंकवाद का स्थायी समाधान नहीं।
कट्टरपंथ का सामाजिक आधार, ऑनलाइन भर्ती, ड्रग्स और हवाला, क्रिप्टो-फंडिंग, कमजोर शासन, अफगानिस्तान की अस्थिरता और पश्चिम एशिया के युद्ध आतंकवाद को पुनर्जीवित करने वाली परिस्थितियां हैं। हूती, आईएस या तालिबान जैसे अलग-अलग संगठनों के लिए एक ही रणनीति भी कारगर नहीं हो सकती। दुनिया को आतंकवाद के खिलाफ एक और 'युद्ध' से ज्यादा एक ऐसी स्थायी व्यवस्था की आवश्यकता है, जिसमें आतंकवादी संगठन, उनके वित्तदाता, हथियार आपूर्तिकर्ता और सुरक्षित पनाह देने वाले-सबकी सज़ा तय हो।
बिश्केक की सफलता इसी में है कि भारत आतंकवाद के खिलाफ समान नियम, समान जवाबदेही और बिना दोहरे मानदंड वाली अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्था के निर्माण में अपनी भूमिका बढ़ाए। फिलहाल भारत ने अपनी आवाज बुलंद कर दी है। अब कूटनीतिक सहमति ठोस कार्रवाई में बदले तो बिश्केक का संदेश आतंकवाद के खिलाफ वैश्विक मोड़ साबित हो।
