बोध कथा : सच्चा मित्र

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Edited By Anjali Singh
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राघव और मोहन बचपन के मित्र थे। दोनों की मित्रता इतनी गहरी थी कि गांव में लोग उनकी दोस्ती की मिसाल दिया करते थे। स्कूल से लेकर खेल के मैदान तक वे हमेशा साथ रहते। जीवन की राह अलग होने के बाद भी उनके बीच का अपनापन कभी कम नहीं हुआ। पढ़ाई पूरी करने के बाद राघव नौकरी के लिए शहर चला गया, जबकि मोहन अपने पिता के साथ गांव में रहकर खेती करने लगा। समय बीतता गया। दोनों अपनी-अपनी जिंदगी में व्यस्त हो गए, लेकिन जब भी अवसर मिलता, एक-दूसरे से जरूर बात करते। सुख-दु:ख की बातें साझा होतीं और पुरानी यादों को याद करके दोनों खूब हंसते।

एक साल गांव में भयंकर सूखा पड़ा। बारिश न होने के कारण खेत सूख गए और मोहन की पूरी फसल बर्बाद हो गई। खेती ही उसकी आय का मुख्य साधन थी। फसल खराब होने के साथ ही उसके घर की आर्थिक स्थिति भी बिगड़ने लगी। बच्चों की स्कूल फीस, घर का खर्च और पुराने कर्ज की चिंता उसे भीतर से परेशान करने लगी।

मोहन ने गांव के कई लोगों से मदद मांगी, लेकिन हर किसी ने अपनी मजबूरी बता दी। आखिर उसने राघव को एक पत्र लिखा। पत्र में उसने अपनी परेशानी का पूरा हाल तो बताया, लेकिन मदद के लिए एक शब्द भी नहीं लिखा। पत्र के अंत में उसने केवल इतना कहा-“उम्मीद है, तुम ठीक होगे।” पत्र पढ़ते ही राघव समझ गया कि मोहन ने अपनी परेशानी बताकर भी उससे सहायता क्यों नहीं मांगी। अगले ही दिन उसने जरूरी काम निपटाया और गांव के लिए रवाना हो गया। सुबह अचानक राघव को अपने घर के सामने देखकर मोहन हैरान रह गया। दोनों मित्र गले मिले। कुछ देर तक दोनों के मुंह से कोई शब्द नहीं निकला।

फिर राघव ने कहा, “तुमने मुझे अपनी परेशानी बताने में इतनी देर क्यों कर दी?”

मोहन ने धीमे स्वर में कहा, “मैं तुम्हें परेशान नहीं करना चाहता था। सोचा, अपनी समस्या खुद ही संभाल लूंगा।” राघव ने उसके कंधे पर हाथ रखा और बोला, “मित्र वह नहीं जो केवल खुशी में साथ बैठकर हंसे। सच्चा मित्र वह है जिसके सामने दुख कहने में भी संकोच न हो।” यह कहते हुए राघव ने कुछ कागज मोहन के हाथ में रख दिए। मोहन ने देखा तो वे उसके बच्चों की स्कूल फीस की रसीदें थीं। इसके साथ ही राघव ने खेती के लिए बीज और जरूरी सामान का इंतजाम भी कर दिया था। मोहन की आंखों में आंसू आ गए। उसने कहा, “लेकिन मैंने तो तुमसे मदद मांगी ही नहीं थी।”

राघव मुस्कुराया और बोला, “सच्ची मित्रता में हर बात शब्दों में कहनी नहीं पड़ती। कभी-कभी मित्र की चुप्पी ही उसकी सबसे बड़ी पुकार होती है।” मोहन ने अपने मित्र को गले लगा लिया। उस दिन दोनों को महसूस हुआ कि वर्षों का अंतर उनकी मित्रता को कमजोर नहीं कर पाया था। सच्ची दोस्ती समय और दूरी से नहीं, बल्कि विश्वास और संवेदना से मजबूत होती है। कथा से सीख मिलती है कि सच्चा मित्र वह है, जो हमारे कहने से पहले हमारी परेशानी समझ ले और जरूरत के समय बिना किसी स्वार्थ के हमारे साथ खड़ा हो। मित्रता की असली परीक्षा सुख में नहीं, दुख के समय होती है।