बोध कथा : सच्चे धन की पहचान

Amrit Vichar Network
Edited By Anjali Singh
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एक नगर में सोमदत्त नाम का एक बहुत धनी व्यापारी रहता था। उसके पास अपार संपत्ति, बड़े-बड़े मकान और कई दुकानें थीं। इसके बावजूद वह हमेशा चिंतित रहता था। उसे लगता था कि जितना धन उसके पास है, उससे कहीं अधिक धन उसे अभी चाहिए। एक दिन नगर में एक वृद्ध साधु आए।

व्यापारी उनके पास पहुंचा और बोला, “महाराज! मेरे पास सब कुछ है, फिर भी मन को शांति नहीं मिलती। कृपया कोई ऐसा उपाय बताइए, जिससे मुझे सच्चा सुख मिल सके।” साधु मुस्कुराए और बोले, “कल सुबह अपनी सबसे मूल्यवान वस्तु लेकर मेरे पास आना।” अगले दिन व्यापारी सोने के आभूषणों से भरी एक पेटी लेकर पहुंचा। उसने गर्व से कहा, “महाराज, इससे अधिक मूल्यवान मेरे पास कुछ नहीं है।”

साधु उसे नगर के बाहर एक गरीब किसान की झोपड़ी के पास ले गए। किसान के घर में खाने के लिए भी पर्याप्त अनाज नहीं था। साधु ने व्यापारी से कहा, “अपनी पेटी खोलो और इसमें से कुछ धन इस परिवार को दे दो।” व्यापारी कुछ क्षण सोचता रहा, फिर उसने किसान को पर्याप्त धन दे दिया। किसान की आंखों में खुशी के आंसू आ गए। उसने हाथ जोड़कर व्यापारी को आशीर्वाद दिया।

वापस लौटते समय साधु ने पूछा, “आज तुम्हें कैसा लगा?” व्यापारी ने कहा, “महाराज, आज पहली बार मुझे लगा कि मेरा धन किसी के काम आया। उस किसान के चेहरे की खुशी देखकर मेरे मन को जो आनंद मिला, वह मुझे अपनी संपत्ति गिनते समय कभी नहीं मिला।” साधु बोले, “यही सच्चे धन की पहचान है, जो संपत्ति केवल तुम्हारे पास बंद पड़ी रहे, वह तुम्हें समृद्ध दिखा सकती है, लेकिन जो किसी जरूरतमंद के जीवन में खुशियां ला दे, वही तुम्हें वास्तव में समृद्ध बनाती है।”

उस दिन के बाद व्यापारी ने अपनी संपत्ति का एक हिस्सा जरूरतमंदों की सहायता के लिए समर्पित कर दिया। धीरे-धीरे उसके मन की चिंता कम होने लगी और जीवन में संतोष बढ़ने लगा। कथा की सीख है कि धन का मूल्य उसे जमा करने में नहीं, बल्कि उसका सदुपयोग करने में है। दूसरों के जीवन में खुशियां बांटने से मिलने वाला संतोष ही सच्ची समृद्धि है।