हाथियों के रास्ते पर न खड़ी हों विकास की दीवारें
हाथियों के पारंपरिक आवागमन मार्ग केवल जंगल की पगडंडियां नहीं, बल्कि उनकी पीढ़ियों से चली आ रही स्मृति, अनुभव और सामाजिक जीवन का हिस्सा हैं। जलस्रोत, भोजन और सुरक्षित क्षेत्रों की तलाश में हाथी मौसम के साथ अपने आवागमन का क्षेत्र बदलते हैं। ऐसे में सड़क, रेल, बस्ती, खनन या अन्य निर्माण के कारण इनके रास्ते बाधित होना केवल वन्यजीवों के लिए संकट नहीं, बल्कि पूरे पारिस्थितिक संतुलन के लिए खतरा है।
सर्वोच्च न्यायालय के हालिया निर्देश ने इसी गंभीर चुनौती की ओर देश का ध्यान खींचा है। हाथी गलियारों के नए सर्वेक्षण और पारंपरिक मार्गों में अवरोध रोकने का निर्देश विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन की आवश्यकता को रेखांकित करता है। हाथियों के अस्तित्व और मानव सुरक्षा, दोनों के लिए जरूरी है कि विकास की योजनाएं प्रकृति के रास्तों को समझकर बनाई जाएं।
17 अगस्त 2026 को सर्वोच्च न्यायालय ने हाथी गलियारों के संबंध में महत्वपूर्ण निर्देश देते हुए केंद्र सरकार को देशभर में इन गलियारों का नया सर्वेक्षण कराने और यह सुनिश्चित करने को कहा कि राज्यों द्वारा हाथियों के पारंपरिक आवागमन मार्गों में अवरोध न पैदा किए जाएं। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि फसल क्षति अथवा मानव-संपत्ति को संभावित नुकसान हाथी गलियारे बंद करने का आधार नहीं हो सकता। जंगल में हाथी का चलना केवल एक वन्यजीव की यात्रा नहीं है। उसके प्रत्येक कदम के पीछे प्रकृति की एक लंबी कहानी होती है। कोई रास्ता उसके लिए अचानक पैदा नहीं होता। कई मार्ग ऐसे होते हैं, जिन्हें हाथियों की पीढ़ियां लंबे समय से इस्तेमाल करती आई हैं। अनुभवी हाथियों को जलस्रोतों की दिशा याद रहती है, भोजन मिलने वाले क्षेत्र याद रहते हैं, मौसम के साथ बदलने वाले वन क्षेत्र याद रहते हैं और खतरे वाले स्थानों का अनुभव भी उनके सामाजिक ज्ञान का हिस्सा बन जाता है। नई पीढ़ी इस ज्ञान को अपने समूह के बड़े और अनुभवी सदस्यों के साथ चलते हुए सीखती है। यही कारण है कि हाथियों के पारंपरिक आवागमन मार्गों को केवल जमीन पर बनी कोई पगडंडी समझना बड़ी भूल होगी। वे हाथियों की सामाजिक स्मृति, उनके पारिवारिक जीवन और उनके अस्तित्व की भौगोलिक व्यवस्था का हिस्सा हैं। जब ऐसे मार्गों के बीच मनुष्य सड़क, रेलपथ, बस्ती, उद्योग, खनन क्षेत्र, दीवार या दूसरी स्थायी रुकावट खड़ी कर देता है, तब केवल एक रास्ता बंद नहीं होता, एक पूरी पारिस्थितिक व्यवस्था बाधित होती है।
17 अगस्त 2026 को सर्वोच्च न्यायालय ने इसी गंभीर प्रश्न को राष्ट्रीय स्तर पर सामने रखा। न्यायालय ने केंद्र सरकार को देशभर के हाथी गलियारों का नया व्यापक सर्वेक्षण कराने का निर्देश दिया और यह पता लगाने को कहा कि कहीं राज्यों ने हाथियों के इन मार्गों में अवरोध तो नहीं खड़े कर दिए हैं। न्यायालय का संदेश स्पष्ट था कि हाथियों के आवागमन के रास्ते केवल इसलिए बंद नहीं किए जा सकते कि उनसे फसल को नुकसान पहुंच रहा है। न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि वन्यजीवों के आवागमन में बाधा स्वीकार्य नहीं हो सकती। सर्वोच्च न्यायालय का यह निर्देश इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह केवल हाथी संरक्षण का प्रश्न नहीं है। यह इस बात की भी परीक्षा है कि भारत विकास और प्रकृति के बीच संतुलन कैसे स्थापित करता है।
हाथियों के लिए जरूरी गलियारे
देश में हाथियों के लिए चिह्नित गलियारों की संख्या 150 है। वर्ष 2023 में तैयार किए गए हाथी गलियारा आकलन में इन्हें देश के चार प्रमुख भौगोलिक क्षेत्रों में चिह्नित किया गया था। पूर्व-मध्य क्षेत्र में 52, पूर्वोत्तर में 48, दक्षिणी क्षेत्र में 32 और उत्तरी क्षेत्र में 18 गलियारे दर्ज किए गए। इन मार्गों में अंतर्राज्यीय और भारत-नेपाल के बीच आने-जाने वाले सीमापार गलियारे भी शामिल हैं। ये आंकड़े अपने आप में बहुत कुछ कहते हैं। हाथी किसी एक जिले, राज्य या संरक्षित वन की सीमा में बंधकर रहने वाला जीव नहीं है। उसके जीवन का भूगोल प्रशासनिक नक्शे से कहीं बड़ा है। हाथी को यदि जंगल में पर्याप्त भोजन मिल जाए, पानी मिल जाए और सुरक्षित आश्रय मिल जाए, तब भी उसके लिए एक ही स्थान पर स्थायी रूप से रहना हमेशा संभव नहीं होता। मौसम बदलता है, वनस्पतियों की उपलब्धता बदलती है, जलस्रोतों की स्थिति बदलती है और उसके साथ उसकी गतिविधियों का क्षेत्र भी बदलता है। इसलिए हाथियों के लिए बड़े और आपस में जुड़े हुए वन क्षेत्र अत्यंत आवश्यक हैं।
गलियारों के पीछे छिपी हाथियों की स्मृति
हाथियों का व्यवहार समझे बिना उनके गलियारों को समझना संभव नहीं है। हाथी अत्यंत सामाजिक प्राणी है। एशियाई हाथियों के पारिवारिक समूहों में मुख्य भूमिका मादाओं की होती है। एक समूह में संबंधित मादाएं और उनके बच्चे रह सकते हैं। इनमें सबसे अनुभवी मादा अक्सर समूह के निर्णयों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। उसके पास केवल उम्र नहीं होती, बल्कि वर्षों का अनुभव होता है। किस दिशा में पानी मिलेगा? किस स्थान पर भोजन अधिक उपलब्ध होगा? किस मार्ग से जाना सुरक्षित है? किस क्षेत्र में मनुष्यों की गतिविधि अधिक है? किस मौसम में कौन-सा क्षेत्र उपयोगी रहेगा? ऐसी अनेक जानकारियां अनुभव के साथ विकसित होती हैं और समूह के व्यवहार को प्रभावित करती हैं।
इस दृष्टि से वृद्ध मादा हाथी को जंगल का चलता-फिरता ज्ञानकोष कहा जा सकता है। हाथियों की सामाजिक सीख का महत्व इसलिए भी बड़ा है, क्योंकि नई पीढ़ी अपने पर्यावरण की जानकारी अकेले नहीं जुटाती। बच्चे बड़े हाथियों के साथ चलते हैं, उनके व्यवहार को देखते हैं और धीरे-धीरे अपने परिवेश को समझना सीखते हैं। वैज्ञानिक अध्ययनों में हाथियों की स्मरणशक्ति और सामाजिक सीख की क्षमता पर पर्याप्त ध्यान दिया गया है। इसलिए यह कहना अधिक वैज्ञानिक होगा कि हाथियों के रास्ते केवल किसी एक पीढ़ी की पसंद नहीं होते, वे अनुभव, स्मृति और सामाजिक सीख के माध्यम से लंबे समय तक बने रह सकते हैं। यहीं से हाथी गलियारों का असली महत्व सामने आता है। यदि किसी क्षेत्र में हाथियों की कई पीढ़ियां एक विशेष मार्ग का उपयोग करती रही हैं और बाद में उसी मार्ग पर मानव गतिविधि बढ़ जाती है, तो हाथियों के सामने एक कठिन परिस्थिति पैदा होती है। वे अपने परिचित भू-दृश्य को पहचानते हैं, लेकिन वहां अब मनुष्य की उपस्थिति और कृत्रिम अवरोध मौजूद होते हैं। तराई इसका बहुत महत्वपूर्ण उदाहरण है।
