देवभूमि की ‘अछूत राजनीति’ में कौन लगा रहा शुद्धिकरण का तड़का? हल्द्वानी के रामलीला मैदान से निकला 2027 का सियासी संदेश
भाजपा और कांग्रेस के बीच बदलती राजनीतिक रणनीति
हल्द्वानी से अजय दयाल।
अमृत विचार: उत्तराखंड की राजनीति में हल्द्वानी का रामलीला मैदान अब सिर्फ रैली और धार्मिक आयोजनों का स्थल नहीं रह गया है। आठ अगस्त को कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे की सभा और उसके दो दिन बाद हुए कथित ‘शुद्धिकरण’ ने ऐसा सियासी विवाद खड़ा किया है, जिसकी गूंज देहरादून से दिल्ली और सड़क से संसद तक सुनाई दे रही है। 2027 के विधानसभा चुनाव से करीब एक साल पहले यह घटनाक्रम भाजपा और कांग्रेस के बीच बदलती राजनीतिक रणनीति का बड़ा संकेत बनकर उभरा है।
आठ अगस्त को खरगे ने हल्द्वानी के रामलीला मैदान में कांग्रेस की ‘विजय शंखनाद रैली’ को संबोधित किया। इसके दो दिन बाद श्री राम सेवा/धर्मार्थ न्यास से जुड़े लोगों ने वहां हवन-पूजन और गंगाजल छिड़ककर कथित शुद्धिकरण किया। आयोजकों की ओर से तर्क दिया गया कि रैली के दौरान कथित आपत्तिजनक नारे लगे थे और मैदान की धार्मिक गरिमा प्रभावित हुई थी।
लेकिन कांग्रेस ने इसे महज धार्मिक अनुष्ठान मानने से इनकार कर दिया। पार्टी ने इसे दलित सम्मान और सामाजिक बराबरी से जोड़ दिया। मामला इतना बढ़ा कि 13 अगस्त को राज्यसभा में खरगे ने खुद इसका उल्लेख किया। जवाब में भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा ने घटना को दुखद बताते हुए जांच की बात कही और स्पष्ट किया कि भाजपा ऐसी गतिविधियों का समर्थन नहीं करती।
यहीं से हल्द्वानी का विवाद स्थानीय घटना से निकलकर राष्ट्रीय राजनीतिक नैरेटिव का हिस्सा बन गया। कांग्रेस के लिए यह मुद्दा इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि खरगे अनुसूचित जाति समुदाय से आते हैं। पार्टी इसे संविधान, सामाजिक न्याय और दलित सम्मान के बड़े विमर्श से जोड़ रही है। भाजपा का आरोप है कि कांग्रेस घटना को जातीय रंग देकर राजनीतिक लाभ उठाने की कोशिश कर रही है।
हाल ही में विवाद ने फिर जोर पकड़ा। राहुल गांधी ने दिल्ली में बकायदा मीउिया को संबोधित करते हुए कहा कि खरगे के लिए न्याय होना चाहिए और शुद्धिकरण करने वालों के खिलाफ एफआईआर दर्ज की जानी चाहिए। उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से एससी/एसटी एक्ट के तहत कार्रवाई की मांग भी उठाई। राहुल ने इस घटना को व्यापक वैचारिक संघर्ष- संविधान बनाम संघ-भाजपा की विचारधारा- के रूप में पेश किया।
राहुल के हमले के बाद उत्तराखंड के मुख्यमंत्री मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने भी मोर्चा संभाला। धामी ने कहा कि शुद्धिकरण में भाजपा का कोई नेता या कार्यकर्ता शामिल नहीं था और उत्तराखंड में लोगों को खरगे की जाति तक मालूम नहीं है। उन्होंने कांग्रेस पर मुद्दाविहीन होने और तुष्टिकरण की राजनीति करने का आरोप लगाया। वहीं, धामी सरकार के मंत्री खजान दास ने भी भाजपा का घटना से कोई संबंध होने से इनकार किया।
भाजपा की ओर से अब यह तर्क भी सामने आ रहा है कि शुद्धिकरण करने वालों में दलित समुदाय के लोग भी शामिल थे और पूरे घटनाक्रम को जातिगत भेदभाव के रूप में पेश करना सही नहीं है। दूसरी तरफ कांग्रेस इसे प्रतीकात्मक छुआछूत और सामाजिक अपमान का सवाल बता रही है। यानी विवाद का केंद्र अब यह नहीं रह गया कि मैदान में हवन क्यों हुआ, बल्कि यह बन गया है कि उस हवन का राजनीतिक और सामाजिक अर्थ क्या निकाला जाए।
दिलचस्प बात यह है कि भाजपा और कांग्रेस दोनों इस विवाद को अपने-अपने बड़े नैरेटिव से जोड़ रहे हैं। कांग्रेस जहां दलित सम्मान, संविधान और सामाजिक न्याय को 2027 की लड़ाई का आधार बनाना चाहती दिख रही है, वहीं भाजपा राष्ट्रवाद, हिंदुत्व, धार्मिक आस्था और कांग्रेस की कथित तुष्टिकरण की राजनीति के सवाल को आगे कर रही है।
इसी कड़ी में कांग्रेस की ‘छात्रों की गूंज’ जैसी पहलें बेरोजगारी, भर्ती, पेपर लीक और युवाओं के सवालों को केंद्र में ला रही हैं। वहीं, दूसरी तरफ भाजपा वंदे मातरम्, सेना के सम्मान और राष्ट्रवाद जैसे मुद्दों के जरिए अपना वैचारिक आधार मजबूत करने में जुटी है।
इस पूरी कथित सियासी कवायद का असली लक्ष्य 2027 है। कांग्रेस के सामने चुनौती सत्ता विरोधी भावनाओं को सामाजिक और राजनीतिक गठजोड़ में बदलने की है, जबकि भाजपा लगातार दो विधानसभा चुनावों में मिली सफलता के बाद अपनी पकड़ कायम रखना चाहती है। ऐसे में हल्द्वानी का ‘शुद्धिकरण विवाद’ आने वाले दिनों में कितना बड़ा चुनावी मुद्दा बनता है, यह देखना दिलचस्प होगा।
फिलहाल इतना जरूर साफ है कि देवभूमि की सियासत में ‘शुद्धिकरण’ का यह तड़का सिर्फ एक मैदान तक सीमित नहीं रहने वाला। यह विवाद जाति, धर्म, संविधान, राष्ट्रवाद और सामाजिक न्याय के उन सवालों को फिर सामने ला रहा है, जिनके इर्द-गिर्द 2027 की उत्तराखंड चुनावी पटकथा लिखी जा सकती है।
