सामने आया प्रागैतिहासिक कला का जैविक रहस्य
क्या कला सिर्फ सौंदर्य की अभिव्यक्ति मात्र है? या इससे इतर कुछ और भी? हाल के वर्षों के कुछ वैज्ञानिक अध्ययनों ने जो निष्कर्ष सामने लाया है, वह गुफा चित्रों और उसके निर्माताओं के ज्ञान और अनुभव की एक नई कहानी सुनाती है। इस कहानी से यह रहस्य भी खुलता है कि सभ्यता के आरंभिक दौर में कला केवल सौंदर्य की अभिव्यक्ति नहीं थी। वह मनुष्य, प्रकृति, आस्था और अस्तित्व के बीच संवाद का माध्यम भी थी। यह संभव हुआ है जब प्रागैतिहासिक शैलचित्रों को आधुनिक वैज्ञानिक तकनीकों की सहायता से देखा और परखा गया है, तब उनके पीछे छिपे अनेक ऐसे रहस्य सामने आ रहे हैं, जो कला इतिहास को नए ढंग से समझने के लिए प्रेरित करते हैं। -सुमन कुमार सिंह, कला लेखक
दक्षिण चीन की ज़ुओजियांग नदी घाटी में स्थित चूना-पत्थर के चट्टानों पर बने हुआशान रॉक आर्ट के लाल भित्तिचित्र इसका एक उल्लेखनीय उदाहरण हैं। दो हजार से अधिक वर्षों तक उष्णकटिबंधीय मानसून, अत्यधिक नमी और वर्षा को झेलने के बावजूद इन चित्रों का रंग आज भी काफी हद तक सुरक्षित है। जर्नल ऑफ अर्कियोलोजिकल साइंस में प्रकाशित एक अध्ययन में शोधकर्ताओं ने आधुनिक रासायनिक विश्लेषण, स्पेक्ट्रोस्कोपी और प्रोटिओमिक्स जैसी तकनीकों के माध्यम से इन चित्रों में प्रयुक्त पदार्थों की संरचना को समझने का प्रयास किया। अध्ययन के निष्कर्षों के अनुसार, चित्र बनाने के लिए चूने को पानी के साथ मिलाकर कैल्शियम हाइड्रॉक्साइड का आधार तैयार किया गया। इसमें रक्त तथा कैल्शियम फॉस्फेट जैसे पदार्थों की उपस्थिति पाई गई, जबकि लाल रंग के लिए हेमेटाइट युक्त मिट्टी का इस्तेमाल किया गया। जब यह मिश्रण वातावरण में मौजूद कार्बन डाइऑक्साइड के संपर्क में आया, तो कैल्शियम कार्बोनेट का निर्माण हुआ। शोधकर्ताओं के अनुसार, रक्त में मौजूद प्रोटीन ने इस प्रक्रिया को प्रभावित करते हुए एक मजबूत जैव-खनिजीय संरचना तैयार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, जिसके परिणामस्वरूप यह पिगमेंट यानी लाल रंग चट्टान की सतह से अधिक मजबूती से जुड़ गया।
यह खोज इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि इससे पता चलता है कि प्राचीन कलाकार केवल रंगों का उपयोग करने वाले कारीगर नहीं थे। वे उपलब्ध प्राकृतिक पदार्थों के गुणों और उनके व्यवहार को अनुभव के आधार पर समझते थे। आधुनिक विज्ञान आज जिस प्रक्रिया को जैव-खनिजीकरण जैसी वैज्ञानिक अवधारणाओं के माध्यम से समझ रहा है, संभव है कि उसका व्यावहारिक ज्ञान प्राचीन कलाकारों को पहले से ही रहा हो। इस शोध का सबसे रोचक पक्ष रक्त की संभावित भूमिका से जुड़ा है। रक्त का उल्लेख स्वाभाविक रूप से बलि, हिंसा या धार्मिक अनुष्ठानों की ओर हमारा ध्यान ले जाता है, लेकिन अध्ययन से जुड़े एक अन्य अनुमान के अनुसार, हुआशान के चित्रों से संबंधित तत्कालीन समाज में रक्त का संबंध जीवन और उर्वरता से भी रहा हो।
इन नमूनों में कुछ ऐसे प्रोटीनों की पहचान की गई है, जिन्हें शोधकर्ताओं ने गर्भावस्था और प्रसव से जुड़े जैविक संकेतों के रूप में देखा है। इसी आधार पर यह संभावना व्यक्त की गई है कि चित्रों में प्रयुक्त जैविक पदार्थ यानी रक्त किसी हिंसक अनुष्ठान के बजाय प्रसव अथवा मासिक धर्म जैसी प्राकृतिक जैविक प्रक्रियाओं से संबंधित रहे हों। यदि यह व्याख्या आगे के शोध में पुष्ट होती है, तो इन चित्रों को जीवन-सृजन, मातृत्व और उर्वरता से जुड़े अनुष्ठानों के संदर्भ में देखने का एक नया रास्ता खुल सकता है।
ऐसे में हुआशान का अध्ययन भारतीय शैलकला (गुफा चित्रों) को समझने के लिए भी कुछ दिलचस्प प्रश्न सामने रखता है। मध्य प्रदेश के यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल ‘भीमबेटका’ की गुफाओं में लगभग 10,000 से 30,000 वर्ष पुराने शैलचित्र आज भी जीवंत हैं। भारतीय पुरातत्वविद् लंबे समय से यह मानते रहे हैं कि इन चित्रों में गेरू (हेमेटाइट) के साथ पशुओं की चर्बी, पौधों के दूधिया रस, अंडे की जर्दी और संभवतः रक्त जैसे जैविक बाइंडर्स का उपयोग किया जाता था। हालांकि प्रत्येक स्थल और कालखंड के लिए इसकी पुष्टि अलग-अलग वैज्ञानिक परीक्षणों से ही संभव हो सकती है।
भारत की पारंपरिक भित्ति-चित्र कलाओं (जैसे कि केरल की टेंपरा म्यूरल पेंटिंग्स या वर्ली और माडना लोक कला) में आज भी प्राकृतिक पिगमेंट को चूने, गोंद और जैविक द्रव्यों के साथ मिलाकर स्थायी बनाने की परंपरा जीवित है। भीमबेटका और लखुआडियार (उत्तराखंड) के चित्रों में दर्शाए गए सामूहिक नृत्य, शिकार और मातृत्व के दृश्य इस बात की पुष्टि करते हैं कि प्राचीन भारतीय समाज में भी कला का संबंध केवल सौंदर्य से नहीं, बल्कि जीवन की निरंतरता और अनुष्ठानों से था।
इसलिए हुआशान के चित्र हमारे सामने इस नवीन तथ्य को उद्घाटित करते हैं कि प्राचीन कला को केवल सौंदर्य की दृष्टि से देखना पर्याप्त नहीं है। उसके भीतर पदार्थ-विज्ञान, पर्यावरणीय ज्ञान, धार्मिक विश्वास और सामाजिक जीवन का अनुभव भी छिपा हो सकता है। संभव है कि प्रागैतिहासिक कलाकार ने शायद रसायन विज्ञान की आधुनिक शब्दावली नहीं जानी होगी, लेकिन उसके पास प्रकृति के पदार्थों को पहचानने, उन्हें मिलाने और उनके व्यवहार को अनुभव से समझने की क्षमता अवश्य थी। यही अनुभव पीढ़ी-दर-पीढ़ी तकनीक में बदलता गया। इस अर्थ में हुआशान की लाल भित्तिचित्रित चट्टानें केवल दो हजार वर्ष पुरानी कला-कृतियां नहीं हैं। वे मनुष्य की उस अद्भुत यात्रा का साक्ष्य हैं, जिसमें आस्था, प्रकृति, पदार्थ और सृजन एक-दूसरे से जुड़े हुए थे। आज आधुनिक विज्ञान उन प्राचीन प्रयोगों के रहस्यों को खोल रहा है और हमें यह समझने का अवसर दे रहा है कि कालजयी कला केवल कलाकार की कल्पना से नहीं, बल्कि मनुष्य, प्रकृति और जीवन के साथ के गहरे अनुभव से भी जन्म लेती है।
