राजा जनक को ज्ञान की प्राप्ति  

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Edited By Anjali Singh
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एक बार राजा जनक ने चाहा कि मैं परमपद हासिल करूं। यह सोचकर उसने 1000 गायें मंगवाईं और हर गाय के सींग पर 20-20 मोहरें बांध दीं। उसने हुक्म दिया कि जो व्यक्ति शास्त्रार्थ में जीत जाए, वही ये गायें ले जाए। कई महीने तक वाद-विवाद होता रहा। आखिर याज्ञवल्क्य सभी ऋ षियों से अव्वल निकले और 1000 गायें मोहरों समेत ले गए। राजा ने कहा कि जो मुझे अंदर ले जाकर ज्ञान करवाएगा, उसे मोहरों समेत 1000 गायें और दूंगा। याज्ञवल्क्य वाचक ज्ञानी थे। उन्होंने तर्क भरी बातों से सारा सिद्धांत समझा दिया, मगर आंतरिक ज्ञान यानी अनुभव न करवा सके।

अंत में राजा ने एक सिंहासन बनवाया। उसने मुल्क के सारे महात्माओं को बुलाया और कहा कि जो भी मुझे ज्ञान दे सके, वह इस सिंहासन पर बैठकर दे। परंतु सत्य यह है कि मुझे ज्ञान उतने समय में चाहिए, जितना समय घोड़े पर सवार होने में लगता है।

सभी महात्माओं की यही राय थी कि ज्ञान कोई घोलकर पिलाने वाली चीज नहीं है। पहले कुछ लिखाया-पढ़ाया जाए, फिर आगे बताया जाए। इतने में वहां ऋ षि अष्टावक्र जी आ गए। वह शरीर से कुबड़े और छोटे कद के थे। उन्होंने सोचा कि अगर राजा को आंतरिक ज्ञान का अनुभव न हुआ तो महात्मा के भेष को लाज आएगी। यह सोचकर वह चुपचाप सिंहासन पर जा बैठे।

राजा जनक के दरबार में तमाम ऋ षि-मुनि बैठे हुए थे। सभी ऋ षियों ने समझा कि कोई पागल व्यक्ति सिंहासन पर आकर बैठ गया है और सभी हंस पड़े। अष्टावक्र जी ने कहा, "मैंने सोचा था कि यह महात्माओं की सभा है, पर लगता है कि आप आत्मा को नहीं, मोचियों की तरह शरीर को देखते हो।" उनकी यह बात सुनकर सभी चुप हो गए।

ऋ षि ने पूछा, “राजा, तू ज्ञान लेना चाहता है?” राजा ने कहा, “जी हां।” अष्टावक्र ने कहा, “ज्ञान की कुछ दक्षिणा भी होती है, शुक्राना भी होता है, देगा?” राजा ने अर्ज की, “जो कुछ मेरे पास है, मंं आपको देने के लिए तैयार हूं।”

अष्टावक्र ने कहा, “मैं भी वही मांगूंगा जो तेरी ताकत में है। मैं तीन चीज मांगता हूं-तन, मन और धन।” राजा ने थोड़ी देर सोचकर कहा, “मैंने दिया।” अष्टावक्र ने कहा, “फिर सोच लो।” राजा ने कहा, “जी, मैंने सोच लिया।” ऋ षि ने कहा, “करो संकल्प।” राजा ने पानी का चुल्लू भरकर संकल्प कर दिया।

अब अष्टावक्र ने कहा, “देख राजा, तू मुझे तन, मन और धन दे चुका है। इसका मालिक अब मैं हूं, तू नहीं। मैं तुझे हुक्म देता हूं कि जहां सबके जूते-चप्पल रखे हैं, वहां जाकर बैठ जा।” ऋ षि की बात सुनकर दरबार में सन्नाटा छा गया। सभी सोचने लगे कि अपनी प्रजा और अपने राज के सामने राजा जूतों में जाकर कैसे बैठेगा। मगर राजा समझदार था। वह बिना झिझके चुपचाप जूतों के पास जाकर बैठ गया।

अष्टावक्र ने ऐसा इसलिए किया कि राजा की लोकलाज छूट जाए। लोकलाज बड़ी भारी रुकावट है। बड़े-बड़े लोग इसके सामने हार जाते हैं। फिर अष्टावक्र ने कहा, “यह धन मेरा है। मेरे धन में मन न लगाना।” राजा का ध्यान कभी औरतों की ओर जाता, फिर लौट आता कि यह ऋ षि की हैं। मुल्क की ओर जाता, फिर लौट आता कि यह भी ऋ षि का है। मन की आदत है कि वह कभी खाली नहीं बैठता। आखिर राजा ने आंखें बंद कर लीं, ताकि न बाहर देखे और न ख्याल बाहर जाए। यही ऋ षि चाहते थे। राजा का ख्याल एकाग्र हो गया।

अष्टावक्र ने पूछा, “तू कहां है?” राजा ने कहा, “मैं अंदर हूं।” ऋ षि ने कहा, “तू मन भी मुझे दे चुका है, खबरदार जो उससे कोई ख्याल उठाया।” राजा समझ गया कि अब मन पर उसका कोई दावा या अधिकार नहीं है। समझने की देर थी कि मन रुक गया। जब ख्याल टिक गया, अष्टावक्र ने अपनी तवज्जो दे दी। रूह अंदर चली गई और रुहानी मंजिलों की सैर करती-करती शब्द की लज्जत लेने लगी।

कुछ देर बाद अष्टावक्र ने राजा का ध्यान वापस बाहर लाया। राजा ने आंखें खोलीं तो ऋ षि ने पूछा, “क्या ज्ञान हो गया?” राजा ने उत्तर दिया, “जी, हो गया। और यह इतना श्रेष्ठ और उत्तम था कि मैंने इसके बारे में कभी सपने में भी नहीं सोचा था।” ऋ षि ने पूछा, “कोई शक तो नहीं रहा?” जनक ने कहा, “कोई शक नहीं।” ऋ षि ने कहा, “मैं यह तन, मन और धन तुझे प्रसाद के तौर पर देता हूं। इन्हें अपना न समझना। राज्य भी कर और भजन भी कर। संसार और उसकी धन-दौलत से मन निकाल दे। अब तुम्हें प्रभु के नाम का अनमोल खजाना मिल गया है। अब संसार की वस्तुओं से मोह नहीं रखना, बल्कि प्रभु से उसके प्रेम और अनुभव की याचना करना।” 

करन सिंह मौर्य, (वरिष्ठ पत्रकार)