राह वही डगमग क्यों है…
कभी फूलती सरसों जिसमें आज वह धरती बंजर है जिन हाथों में कोमलता थी आज क्यों उनमें खंजर है माधुर्य बसा था जिन हृदयों में आज वो विष क्यों उगल रहे वैर भावना पनप रही क्यों रिश्ते क्यों हैं बदल रहे जिन नैनों में स्नेह कभी था आज क्यों शोले बरस रहे मात-पिता क्यों पूत …
कभी फूलती सरसों जिसमें आज वह धरती बंजर है
जिन हाथों में कोमलता थी आज क्यों उनमें खंजर है
माधुर्य बसा था जिन हृदयों में आज वो विष क्यों उगल रहे
वैर भावना पनप रही क्यों रिश्ते क्यों हैं बदल रहे
जिन नैनों में स्नेह कभी था आज क्यों शोले बरस रहे
मात-पिता क्यों पूत मिलन को गांव में तन्हा तरस रहे
कौन ले भागा सबकी खुशियां हर घर में मातम क्यों हैं
अपनों से क्यों बढ़ी दूरियां हर इंसान तन्हा क्यों है
मात न सुनती बात पिता की पूत कपूत बना क्यों है
पत्नी रही न सती सावित्री पुत्री कोख में मरती है
निशा बन गई भोर किसी की रात्रि कहीं जग में क्यों है
मंजिल पर जो पहुंचाती थी राह वही डगमग क्यों है
कोयल अब कोई गीत न गाती कौवे सभी सरताज बने हैं
स्वर लहरियां अंधकार में डूबी, बेसुरे सब साज सजे हैं
-हरीश उप्रेती करन, देवलचौड़ बंदोबस्ती, हल्द्वानी
