मुरादाबाद: देश सेवा के सुनहरे सपने लेकर घरों को लौटीं बेटियां
मुरादाबाद। उत्साह से लबरेज चेहरा। कदम-कदम प्रशासनिक जिम्मेदारी का ताना-बाना। सभी ने विद्यार्थी की तरह प्रशासन की हर गतिविधि समझना चाहती दिखीं। दो घंटे का समय पूरी तरह उपयोग में लाने की चाहत थी। प्रशासन की जिम्मेदारी और जनजन की समस्या समझकर उसके निस्तारण की कोशिश में जुटी रहीं। दो घंटे बाद मुस्कान बिखेरते बेटियां …
मुरादाबाद। उत्साह से लबरेज चेहरा। कदम-कदम प्रशासनिक जिम्मेदारी का ताना-बाना। सभी ने विद्यार्थी की तरह प्रशासन की हर गतिविधि समझना चाहती दिखीं। दो घंटे का समय पूरी तरह उपयोग में लाने की चाहत थी। प्रशासन की जिम्मेदारी और जनजन की समस्या समझकर उसके निस्तारण की कोशिश में जुटी रहीं। दो घंटे बाद मुस्कान बिखेरते बेटियां घरों को लौट गईं।
यह नजारा शनिवार को कलेक्ट्रेट परिसर में दिखा। राज्य सरकार की मिशन शक्ति अभियान का दो घंटा मेधावी बेटियों के लिए विशेष रहा। मेधा से बोर्ड परीक्षाओं में झंडा फहराने वाली बेटियों ने इतिहास रचा। जिम्मेदारी के निर्वाह में कलम चलाई लेकिन, इस मौके पर यह जानने का प्रयास किया कि आईएएस, आईपीएस और पीसीएस और अन्य प्रशासनिक सेवाओं में किस तरह का व्यवहार करना होता है।
जिलाधिकारी बनीं शिखाराज सैनी ने जनसुनवाई के दौरान हर उस आंख में झांकने की कोशिश की जो अधिकारियों के चौखट पर मन की बात लेकर आती हैं। जिलाधिकारी राकेश कुमार सिंह संग कंट्रोल रूम पहुंचकर करोना से जंग के इस केंद्र की हर गतिविधि को समझने का प्रयास किया। जिला अस्पताल में घायलों के बेहतर इलाज के निर्देश दिए।
नामित नगर मजिस्ट्रेट के रूप में श्रद्धा विश्नोई ने शस्त्र लाइसेंस नवीनीकरण कराने आए बुजुर्ग से बिंदुवार सवाल-जवाब किए। बोलीं, सरकार की यह पहल इतिहास बदलेगी। हमें अब प्रशासनिक अधिकारी बनकर देश सेवा करना है। नगर मजिस्ट्रेट महेंद्र प्रताप सिंह से प्रशासनिक ढांचे संग कार्य के तरीके समझे। अपर जिलाधिकारी (वित्त) कशिश भार्गव ने स्टांप वेंडर के आवेदन को सिरे से खारिज कर दिया। आवेदन के भाव से यह महसूस कर लिया कि शासन द्वारा तय कीमत से अधिक दर पर राजस्व पत्र बेचा है।
मेधावी बेटियों ने प्रशासनिक जिम्मेदार बनकर धड़ल्ले से कलम चलाई। जब अधिकारियों ने सरकारी ढांचे को समझाया तो विद्यार्थी बन गईं और बारीकी से जानने का प्रयास किया कि इन सेवाओं का भार कितना होता है और उससे कैसे निभाया जाता है। जनसुनवाई और जिम्मेदारी के प्रोटोकाल के बीच बेटियों ने दो घंटे बिता दिए और फिर स्मृतियों में सपने लिए घर को रवाना हो गईं।
-आशुतोष मिश्र
