उत्तराखंड में केदारनाथ आपदा की भयावह यादें हुईं ताजा, जनिए ‘देवभूमि’ में कब-कब मची तबाही
देहरादून। केदारनाथ आपदा के 7 साल, 7 महीने और 25 दिन बाद रविवार को चमोली में आई बाढ़ ने केदारनाथ की भयावह आपदा की याद दिला दी। गनीमत यह रही कि वर्ष 2013 की तरह इस बार बारिश नहीं थी और आसमान पूरी तरह साफ था। जिससे हेलीकॉप्टर उड़ाने में मौसम बाधा नहीं बना। राज्य …
देहरादून। केदारनाथ आपदा के 7 साल, 7 महीने और 25 दिन बाद रविवार को चमोली में आई बाढ़ ने केदारनाथ की भयावह आपदा की याद दिला दी। गनीमत यह रही कि वर्ष 2013 की तरह इस बार बारिश नहीं थी और आसमान पूरी तरह साफ था। जिससे हेलीकॉप्टर उड़ाने में मौसम बाधा नहीं बना।
राज्य आपदा प्रतिवादन बल (एसडीआरएफ) की टीमें जल्द ही प्रभावित स्थान पर पहुंच गईं और बचाव अभियान तुरंत शुरू कर दिया गया। बता दें कि 16 जून 2013 को उत्तराखंड के रुद्रप्रयाग जनपद में आई आपदा में साढ़े चार हजार से अधिक लोगों की मौत हुई थी। साथ ही कई लोग लापता हो गए थे। इस आपदा में कई क्षेत्रवासी तो अपने घर के भीतर ही मारे गए थे।
वहीं, चार हजार से अधिक गांवों का संपर्क टूट गया था। सैकड़ों घर, होटल, दुकानें वाहन नदी में समा गए थे। वहीं, कई हेक्टेयर कृषि भूमि इस आपदा में समा गई थी। उस दौरान सेना, एनडीआरएफ, एसडीआरएफ और आइटीबीपी की टीमों ने महाअभियान चलाकर यात्रा मार्ग में फंसे 90 हजार यात्री व स्थानीय पुलिस ने 30 हजार यात्रियों को सकुशल रेस्क्यू किया था।
रविवार को उत्तराखंड के चमोली जिले के जोशीमठ में ग्लेशियर टूटने से धौली नदी में अचानक बाढ़ आ गई। इससे जोशीमठ से लेकर हरिद्वार के नदी किनारे बसे लोगों के लिए खतरा बढ़ गया है। इसके बाद हरिद्वार जिले में हाई अलर्ट जारी कर दिया गया है। मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत ने अपने सभी सरकारी कार्यक्रम रद्द कर खुद इस आपदा पर नजर रखे हुए हैं।
प्रदेश के पुलिस महानिदेशक अशोक कुमार ने बताया कि हमारी पुलिस और एसडीआरएफ के जवान पूरी तरह मुस्तैदी से जोशीमठ के पास आई आपदा से निपटने में लगे हैं। हमारा पूरा प्रयास यह है कि जो भी लोग लापता हैं, उन्हें ढूंढा जाए।
मुख्यमंत्री ने बताया कि प्रभावित स्थलों पर बचाव और राहत कार्य मुस्तैदी से चलाया जा रहा है। इसके उलट वर्ष 2013 में आई आपदा में तत्कालीन मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा को आपदा की गंभीरता को समझने में समय लगने के कारण तीखी आलोचना झेलनी पड़ी थी। जिसके चलते उन्हें सत्ता से भी हाथ धोना पड़ा था। दिल्ली से भी खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृह मंत्री आपदा की खबर सुनते ही अलर्ट हो गए और लगातार मुख्यमंत्री रावत के संपर्क में हैं। मोदी और शाह दोनों ने उत्तराखंड को हर संभव मदद का भरोसा दिलाया है।
उत्तराखंड में पिछले तीन दशक में आईं प्राकृतिक आपदाएं
1- वर्ष 1991 उत्तरकाशी भूकंप: अविभाजित उत्तर प्रदेश में अक्टूबर 1991 में 6.8 तीव्रता का भूकंप आया। इस आपदा में कम से कम 768 लोगों की मौत हुई और हजारों घर तबाह हो गए।
2- वर्ष 1998 माल्पा भूस्खलन: पिथौरागढ़ जिले का छोटा सा गांव माल्पा भूस्खलन के चलते बर्बाद हुआ। इस हादसे में 55 कैलाश मानसरोवर श्रद्धालुओं समेत करीब 255 लोगों की मोत हुई। भूस्खलन से गिरे मलबे के चलते शारदा नदी बाधित हो गई थी।
3- वर्ष 1999 चमोली भूकंप: चमोली जिले में आए 6.8 तीव्रता के भूकंप ने 100 से अधिक लोगों की जान ले ली। भूकंप के चलते सड़कों एवं जमीन में दरारें आ गई थीं।
4- वर्ष 2013 उत्तर भारत बाढ़: जून में एक ही दिन में बादल फटने की कई घटनाओं के चलते भारी बाढ़ और भूस्खलन की घटनाएं हुईं थीं। राज्य सरकार के आंकलन के मुताबिक, माना जाता है कि 5,700 से अधिक लोग इस आपदा में जान गंवा बैठे थे। सड़कों एवं पुलों के ध्वस्त हो जाने के कारण चार धाम को जाने वाली घाटियों में तीन लाख से अधिक लोग फंस गए थे।
