निर्दोषों को सजा
कानूनी खामियां कैसे एक निर्दोष को 19 साल से अधिक समय का वक्त जेल में कैदी बनकर काटने को विवश कर देती हैं इसका उदाहरण ललितपुर के विष्णु तिवारी के मामले से मिलता है। विष्णु तिवारी को वर्ष 2000 में गिरफ्तार कर जिस दुष्कर्म और एससी-एसटी एक्ट में जेल भेजा गया था उस मामले में …
कानूनी खामियां कैसे एक निर्दोष को 19 साल से अधिक समय का वक्त जेल में कैदी बनकर काटने को विवश कर देती हैं इसका उदाहरण ललितपुर के विष्णु तिवारी के मामले से मिलता है। विष्णु तिवारी को वर्ष 2000 में गिरफ्तार कर जिस दुष्कर्म और एससी-एसटी एक्ट में जेल भेजा गया था उस मामले में वह आजीवन कारावास की सजा के बाद आगरा के केंद्रीय कारागार में सजा भोग रहा था।
परिवार की आर्थिक स्थिति सही न होने से आजीवन कारावास की सजा के खिलाफ उसके परिवार वाले अपील नहीं कर पाए। ऐसे में विधिक सेवा समिति ने पैरवी की तो जनवरी 2021 में हाईकोर्ट ने विष्णु को निर्दोष करार दिया। उसके बाद 3 मार्च को लंबी सजा के बाद उसकी रिहाई हो सकी।
विष्णु तिवारी तो निर्दोष करार हो गया लेकिन क्या यह संभव नहीं है कि उस जैसे और कितने ही लोग होंगे जो निर्दोष होने के बाद भी सजा भुगत रहे हैं। दरअसल, ये निर्दोष हमारे देश में कानूनी पेंचीदगियों का खमियाजा भुगत रहे हैं। सरकार और न्याय पािलका की ओर से गरीब और जरूरतमंदों को निशुल्क विधिक सहायता देने की बात तो कही जाती है लेकिन विष्णु तिवारी जैसे उन लोगों के लिए यह विधिक सहायता सुलभ होती तो वे न्याय की आस में कैदी बने सजा नहीं भुगत रहे होते।
अब सवाल, विष्णु तिवारी के उन 19 वर्षों का भी है जो उसने निर्दोष होते हुए भी जेल में बिता दिए। क्या अब मिला इंसाफ उसका इतना लंबा वक्त लौटा सकता है? नहीं। जिस उम्र में उसकी शादी होनी थी, उस उम्र में उसे जेल जाना पड़ा। नतीजतन, उसकी शादी भी नहीं हो सकी। ऐसे में, हमारे न्याय तंत्र के सामने यह बड़ी चुनौती है कि कोई भी निर्दोष सजा न पाने पाए, वरना न्याय की अवधारणा कहां रह जाएगी? हमें जरूरत है, ऐसा न्याय तंत्र विकसित करने की, जिसमें कोई दोषी सजा से बच न सके और कोई निर्दोष होते हुए सजा न पाए।
कानूनी खामियों का दूसरा उदाहरण भदोई जिले में सामने आया। 13 साल पहले जिस व्यक्ति का अपहरण करके उसकी हत्या करने के आरोप में चार लोगों को छह साल की सजा सुनाई गई, वह व्यक्ति अब जिंदा निकला है। जािहर है कि चारों लोग निर्दोष पाए गए हैं फिर भी वे सजा भुगत रहे हैं।
सवाल यह है कि इस मामले में पुलिस ने तफ्तीश क्या की? पुलिस ने सच सामने लाने के बजाय कागजी खानापूरी करके चार्जशीट लगा दी। नि:स्संदेह खामी पूरे सिस्टम में है। सजा पाने वाले निर्दोष लोगों को क्षतिपूर्ति मिल भी जाए लेकिन वह वक्त कहां से मिलेगा? निर्दोष होने के बाद भी जेल में बिताने के मिले जख्म उनके दिल में जीवन भर रहेंगे।
