मुरादाबाद: जरा सी लापरवाही ले सकती है बेजुबानों की जान
मुरादाबाद, अमृत विचार। कई बेजुबानों की मौत का कारण जिम्मेदार विभाग तो है ही, पर इसमें आमजन भी कम कसूरवार नहीं है। हमारी एक लापरवाही कई बेजुबानों की बड़ी तकलीफ बन जाती है। यहां तक कि इससे उनकी जान भी जा सकती है। बात यहां पालीथिन की हो रही है, जिस पर कहने को तो …
मुरादाबाद, अमृत विचार। कई बेजुबानों की मौत का कारण जिम्मेदार विभाग तो है ही, पर इसमें आमजन भी कम कसूरवार नहीं है। हमारी एक लापरवाही कई बेजुबानों की बड़ी तकलीफ बन जाती है। यहां तक कि इससे उनकी जान भी जा सकती है। बात यहां पालीथिन की हो रही है, जिस पर कहने को तो प्रतिबंध लगा है। लेकिन, कार्रवाई के नाम पर संबंधित विभाग द्वारा सिर्फ औपचारिकता भर निभाकर पल्ला झाड़ लिया जाता है। वहीं आम नागरिक भी इसकी गंभीरता को समझना नहीं चाहते। सब्जियों के छिलकों को पालीथिन में रखकर डस्टबिन में डाल देना। बचे हुए भोजन को भी पालीथिन के साथ डलावघर में फेंक देना।
यह वह आदत है जो बेजुबानों की मौत का कारण बन जाती है। जी हां, खाद्य पदार्थ को देख भूखे छुट्टा जानवर, खासतौर पर गोवंश उसको खाने का प्रयास करते हैं। पालीथिन को ही भोजन समझकर पूरा उसे निगल जाते हैं। ज्यादातर गोवंश ही इसका घातक परिणाम सहते हैं। पालीथिन जब उनके पेट में जाकर फंस जाती है तो वह पशु गोबर नहीं कर पाते हैं। आवारा पशु होने के कारण विभाग भी इस पर ध्यान नहीं देता और चिकित्सा के अभाव में वे दम तोड़ देते हैं।
पालीथिन के आंत में फंसने से होती है मौत
जिला पशु चिकित्सालय से डा. पीडी जैन बताते हैं कि पालीथिन पशुओं की आंत में फंस जाता है। इससे वे गोबर नहीं कर पाते हैं। पालीथिन से कई प्रकार के विषैले पदार्थ भी निकलते हैं। यह डायजेस्ट नहीं हो सकता है। इसे निकालने का एकमात्र उपाय आपरेशन है, जो कई बार पशुओं के लिए प्राणघातक भी होता है। कई बार पोस्टमार्टम में पशुओं के पेट में पालीथिन निकलती है।
हवा में भी घुल रहा जहर
पालीथिन को कचरे में शामिल कर कई लोग उसे जला देते हैं। जिला अस्पताल के वरिष्ठ चेस्ट फिजीशियन डा. प्रवीण शाह बताते हैं कि पालीथिन जलाने से जहरीली गैस निकलती है। हवा में कार्बन डाइआक्साइड घुल जाती है। जब सांस के माध्यम से यह हवा शरीर में जाती है तो खांसी और दम फूलने की शिकायत शुरू हो सकती है। अस्थमा या सीओपीडी के मरीजों को गंभीर दौरा पड़ सकता है। श्वास संबंधी कई अन्य परेशानी भी हो सकती है।
गोशाला पहुंचाने का अभियान भी पड़ा धीमा
बीते दिनों छुट्टा पशुओं के कारण कई दुर्घटनायें हुईं तो नगर निगम ने शहर में घूम रहे गोवंश को गोशाला लाना शुरू कर दिया। दो सौ के करीब वहां गोवंशी पशु थे, जो अब 252 हो चुके हैं। पर शहर में अभी भी इस वंश के पशु सड़क पर घूमते देखे जा सकते हैं। मुख्य सफाई एवं खाद्य निरीक्षक दिलशाद के पास यह जिम्मेदारी है। उनका कहना है कि शिकायत मिलने पर टीम मौके पर भेजी जाती है और फिर गोवंश गोशाला लाया जाता है। यहां उसको हरा चारा दिया जाता है और उसकी सेहत का भी ख्याल रखा जाता है।
सिर्फ औपचारिकता रह गया अभियान
प्लास्टिक के इस्तेमाल को सीमित करने के लिए रिसाइकिल्ड प्लास्टिक मैन्यूफैक्चर एंड यूजेज रूल्स वर्ष 1999 में 20 माइक्रोन से कम के पालीथिन बैग पर रोक लगाई गई। इसके प्रयोग को रोकने की जिम्मेदारी नगर निगम की है। पर यह विभाग सिर्फ औपचारिकता ही करता है। जब कभी एक दिन चंद दुकानों पर छापामारी कर खलबली मचाने के बाद शांत हो जाता है। नगर निगम के मुख्य कर निर्धारण अधिकारी आरके सोनकर का कहना है कि मानक के अनुसार ही पालीथन का प्रयोग किया जा सकता है। इसका पालन हो इसलिए कई बार कार्रवाई की गई है। समय समय पर अभियान चलाया जाता है।
