अक्सर माँ मिल जाती है मुझे खाली डिब्बों में…

Amrit Vichar Network
Edited By Amrit Vichar
On

अक्सर माँ मिल जाती है मुझे खाली डिब्बों में… जिसमें कभी मठरियां, मैदे की नमकीन मूंगफली तो कभी बेसन के लड्डू होते थे जो हमारे स्कूल से लौट आने के बाद ही खुलते थे मिल जाती है माँ मुझे पुरानी थाली कटोरों में जिसमें सभी भाई बहनों को नाप तोलकर देती थी खाना न किसी …

अक्सर माँ मिल जाती है
मुझे खाली डिब्बों में…
जिसमें कभी मठरियां, मैदे की नमकीन
मूंगफली तो कभी बेसन के लड्डू होते थे
जो हमारे स्कूल से लौट आने के बाद ही खुलते थे

मिल जाती है माँ मुझे पुरानी थाली कटोरों में
जिसमें सभी भाई बहनों को नाप तोलकर देती थी खाना
न किसी को कम न किसी को ज्यादा

माँ पल में पर्दे टांकती,सोफा बिछाती
घर आंगन बुहारती, पल में दीवारें साफ करती
पानी भरती, इधर से उधर लट्टू की तरह फिरती रहती

बाबा के आते ही चाय देती और हमारी शैतानियों के
पिटारे खोल देती, बाबा हमें पीटते तो चुपके चुपके रो देती
हाँ ऐसी ही माँ है होती…

आज जब मायके आती हूँ
तो मां को खोया हुआ पाती हूँ
एक गठरी में मां का सारा सामान पाती हूँ
जिसमें नही हैं अब वो डिब्बे, वो छत
दरो दीवार जिसे संजोया करती थी माँ
कभी बड़े ही करीने से
ढूँढती हूं पहले सी माँ को फिर से
बन्द डिब्बों में…

-सुमीता प्रवीण केशवा मुंबई। मूल निवासी- हल्द्वानी