बस प्यासे पपीहा सा बाट जोह रहा हूँ…

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Edited By Amrit Vichar
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लिखने का शौक है लिख नहीं पाता हूँ, मन की व्यथा को बाहर लाना चाहता हूँ… लिखूं भी तो क्या समझ नहीं पाता हूँ, लोग रूठ बहुत जाते हैं, किनारा कर जाता हूँ… दिल की बात को किसी को समझा नहीं पाता हूं, वो किरदार अब कहाँ..जो कहे सब समझता हूँ… दिल की सुनूं तो …

लिखने का शौक है लिख नहीं पाता हूँ,
मन की व्यथा को बाहर लाना चाहता हूँ…

लिखूं भी तो क्या समझ नहीं पाता हूँ,
लोग रूठ बहुत जाते हैं, किनारा कर जाता हूँ…

दिल की बात को किसी को समझा नहीं पाता हूं,
वो किरदार अब कहाँ..जो कहे सब समझता हूँ…

दिल की सुनूं तो दिमाग कहता मैं भी तो हूँ,
अंदर ही अंदर घुटन लिए बस चलता जा रहा हूँ…

दायित्व जिंदगी के एक ख्वाब में बुनता जा रहा हूँ,
बेवजह मुस्कुराता अपने हाल में जीये जा रहा हूँ…

इस भीड़ में झूठी मुस्कान लिए फिर रहा हूँ,
लगता है खामख्वाह कल के लिए हताश हो रहा हूँ…

कर्म के बदले फल की चिंता कर रहा हूँ,
यही सोच बस व्यर्थ अपने को धोखा दे रहा हूँ…

क्या हकीकत क्या फसाना यही सोचता हूँ,
मंजिल की ख्वाहिश में आवारा भटकता हूँ…

सपने क्या सच होंगे कभी विचार करता हूँ,
उम्मीद का धागे पर न ऐतबार करता हूँ…

मानव हूँ पर मानव जात पर विश्वास न करता हूँ,
ढोंग,फरेब ,छल-कपट पर अक्सर फंस जाता हूँ…

माटी के पुतलों में तमाम रंग देखता हूँ,
चिकनी है मिट्टी इनको परख रहा हूँ…

अवसाद के भंवर में फंसना नहीं चाहता हूँ,
तारीफ है कि अपनी बस निभा रहा हूँ…

न किसी से उम्मीद न कोई रिश्ता निभा रहा हूँ,
बस प्यासे पपीहा सा बाट जोह रहा हूँ…

– भूपेश कन्नौजिया ‘फक्कड़’, हल्द्वानी (नैनीताल)