मुरादाबाद: अपनों ने मोड़ा मुंह तो खाकी बनी अर्थी का ‘चौथा सहारा’…

Amrit Vichar Network
Edited By Amrit Vichar
On

मुरादाबाद, मोहित गौर। वास्तव में कोरोना काल में मानवीय संवेदनायें दम तोड़ती नजर आ रही हैं। कोरोना का खौफ इस कदर है कि लोग अपनों से ही दूरी बनाने लगे हैं। कोई अस्पताल में मर रहा है तो किसी का शव घर में रखा है। परिजन इस आस में हैं कि शायद उनके सुख-दुख में …

मुरादाबाद, मोहित गौर। वास्तव में कोरोना काल में मानवीय संवेदनायें दम तोड़ती नजर आ रही हैं। कोरोना का खौफ इस कदर है कि लोग अपनों से ही दूरी बनाने लगे हैं। कोई अस्पताल में मर रहा है तो किसी का शव घर में रखा है। परिजन इस आस में हैं कि शायद उनके सुख-दुख में शामिल होने वाले पड़ोसी इस दुख भरे वक्त में उनके साथ होंगे। लेकिन, वर्तमान हालातों ने आपसी प्यार व सौहार्द्र के रिश्तों को खत्म कर दिया है।

मानवीय संवेदनायें खत्म होने के ऐसे मामले रोज हमारे सामने आ रहे हैं, जब अपनों ने अपनों का साथ छोड़ दिया। हैरानी की बात यह है कि इस विषम परिस्थिति में वे लोग हमारे अपने हो रहे हैं, जिनको शायद हमने अपने जीवन में कभी अपना सोचा भी नहीं था। बुधवार के ऐसे ही एक मामले में खाकी वाले जवान ने इंसानियत की मिसाल पेश की। यह वह खाकी है, जिसके बारे में कहावत मशहूर है कि न इनसे दोस्ती अच्छी, न दुश्मनी। शायद यह कहावत अपनी जगह सही हो सकती है। लेकिन, लाकडाउन में पुलिस वालों ने इस कहावत को उल्टा कर दिया है। सबसे मुश्किल परिस्थितियों में यह खाकी ही लोगों की रक्षक बन हर सुख-दुख में उनका साथ दे रही है।

बुधवार को एक बार फिर खाकी का बदला चेहरा हमारे सामने आया। इस चेहरे ने आपसी सौहार्द्र को दरकिनार करने वालों को उस समय आइना दिखाया, जब सड़क पर रखे शव को हर किसी ने कंधा देने से इंकार कर दिया। मृतक के बेटे व उसका भाई सड़क से गुजरने वाले राहगीरों से कंधा देने की गुहार लगा रहे थे। लेकिन, सभी ने मुंह मोड़ लिया। अधिकतर लोग कोरोना की वजह से मौत होने के कारण दूरी बना रहे थे। ऐसे में अर्थी का ‘चौथा स्तंभ’ बना लैपर्ड में सवार पुलिसकर्मी। इस सिपाही ने कंधा देने के साथ ही बाकायदा शव को श्मशान घाट तक पहुंचाया और अन्य रस्मों में भी शामिल हुआ।

बेटे और भाई करते रहे चौथे कंधे का इंतजार
बताते हैं कि नागफनी थाना क्षेत्र के बंगलागांव निवासी राकेश कुमार एक शोरूम में सिलाई का काम करते थे। कुछ दिनों पहले उनकी तबियत खराब हो गई। उनके बेटों ने उन्हें एक निजी अस्पताल में भर्ती कराया। हालत में सुधार न होने पर उन्हें जिला अस्पताल में भर्ती कराया गया। वहां पर बुधवार को उन्होने दम तोड़ दिया। बताते हैं कि कोरोना की रिपोर्ट न आने के कारण अस्पताल प्रशासन ने एंबुलेंस से राकेश का शव मुगलपुरा थाना क्षेत्र में लालबाग स्थित शमशान घाट भेज दिया। शव के साथ राकेश के दो बेटे और बड़े भाई पहुंचे। वहां पर पहुंचने के बाद एंबुलेंसकर्मियों ने शव उतारकर जमीन पर रख दिया। अंतिम संस्कार के वक्त जब वहां पर मौजूद कर्मियों ने बिना अर्थी के शव देखा तो अंतिम संस्कार करने से मना कर दिया। बताते हैं कि बेटे और भाई ने किसी तरह अर्थी का इंतजाम तो कर लिया। लेकिन, चौथा कंधा नहीं मिल रहा था। अर्थी उठाने के लिए एक कंधे की तलाश में तीनों लोग काफी देर तक परेशान रहे। राहगीरों के अलावा क्षेत्रीय लोगों के भी हाथ-पैर जोड़े। लेकिन कोरोना के डर के कारण कोई कंधा देने को आगे नहीं आया। ऐसे में मौके से गुजर रहे लैपर्ड में तैनात पुलिसकर्मियों ने जब नजारा देखा तो पूरे मामले की जानकारी ली। हकीकत सामने आने पर एक पुलिसकर्मी ने आगे बढ़कर अर्थी को कंधा दिया। इसके बाद शव का अंतिम संस्कार कराया गया।

 

संबंधित समाचार