गोवंश व पशुधन विकास की बड़ी-बड़ी बातें, किंतु खर्च ऊंट के मुंह में जीरा
संजय सिंह, नई दिल्ली। सरकार गोवंश संवर्द्धन की बड़ी-बड़ी बातें करती है। लेकिन इस मद में उसका खर्च ऊंट के मुंह में जीरे के समान है। अर्थव्यवस्था में 4 फीसद योगदान के बावजूद पशुधन विकास पर सरकार मात्र 0.1 फीसद खर्च करती है। सरकारी उपेक्षा के कारण पशुधन विकास में निजी क्षेत्र की भी कोई …
संजय सिंह, नई दिल्ली। सरकार गोवंश संवर्द्धन की बड़ी-बड़ी बातें करती है। लेकिन इस मद में उसका खर्च ऊंट के मुंह में जीरे के समान है। अर्थव्यवस्था में 4 फीसद योगदान के बावजूद पशुधन विकास पर सरकार मात्र 0.1 फीसद खर्च करती है। सरकारी उपेक्षा के कारण पशुधन विकास में निजी क्षेत्र की भी कोई रुचि नहीं है।
कृषि और पशुपालन दोनों एक-दूसरे से जुड़े हुए व्यवसाय हैं। इसके बावजूद दोनों के प्रति सरकार का रवैया एकदम अलग है। जहाँ कृषि के विकास पर सरकार सालाना 1,35,000 करोड़ रुपये यानी कुल बजट का 4.5 फीसद खर्च करती है। वहीं, पशुधन विकास पर उसका खर्च महज 3500 करोड़ यानी 0.12 फीसद रुपये है।
यह तब है जबकि सकल मूल्यवर्धन (जीवीए) में कृषि क्षेत्र का योगदान घटता और गैर-कृषि क्षेत्र का योगदान लगातार बढ़ता जा रहा है। वर्ष 2014-15 से लेकर 2019-20 के दौरान कृषि क्षेत्र का जीवीए में योगदान 18.2 फीसद से घटकर 17.8 फीसद रह गया। इसमें भी फसलों का हिस्सा 11.2 फीसद से घटकर मात्र 9.4 फीसद रह गया।
कृषि क्षेत्र में हुए इस नुकसान की भरपाई पशुपालन एवं मत्स्यपालन क्षेत्रों दूध, अंडा और मांस का उत्पादन बढ़ाकर की है। इस दौरान देश में दूध का उत्पादन 14.63 करोड़ टन से बढ़कर 19.84 करोड़ टन (5.68 फीसद वार्षिक वृद्धि) हो गया। जबकि अंडों का उत्पादन 78.48 अरब से बढ़कर 114.38 अरब (10.19 फीसद वार्षिक वृद्धि) हो गया। इसी प्रकार 5.98 फीसद की वार्षिक बढ़ोतरी के साथ मांस का उत्पादन भी 67 लाख टन से बढ़कर 86 लाख टन पर पहुंच गया है।
पशुपालन व डेयरी विभाग के अधिकारियों के मुताबिक पशुपालन एवं डेयरी क्षेत्र की आय बढ़ाने की क्षमता मैन्युफैक्चरिंग और सर्विस सेक्टर के लगभग बराबर है। इसके बावजूद सरकार जितना ध्यान मैन्युफैक्चरिंग व सर्विस सेक्टर तथा अनाज उगाने वाले किसानों पर देती है उतना पशुपालन और डेयरी के काम में लगे लोगों पर नहीं देती। सरकार की इस उदासीनता के कारण प्राइवेट सेक्टर भी पशुपालन व डेयरी क्षेत्र में निवेश करने से हिचकता है। यदि सरकार इस क्षेत्र का बजट बढ़ा दे तो निजी कंपनियां भी निवेश के लिए आगे आएंगी।
पशुपालन व डेयरी व मत्स्यपालन को बढ़ावा मिलने से देश में किसानों की आत्महत्याओं पर भी अंकुश लगेगा। नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ एग्रीकल्चर एक्सटेंशन मैनेजमेंट के अध्ययन में ये बात सामने आई है कि जिन गांवों में किसान आत्महत्या करते हैं उनमें वे किसान ज्यादा होते हैं जिनके पास गायों या पशुओं की कमी है। इसी प्रकार जो किसान खेती के साथ पशुपालन भी करते हैं उनमें आत्महत्या की प्रवृत्ति बहुत कम पाई गई है।
इस तथ्य के बावजूद पशुपालकों को सरकार की ओर से उस तरह की सब्सिडी उपलब्ध नहीं है जैसी फसल उगाने वाले किसानों को मिलती है। न बिजली में और न चारा व दाना-पानी में। फसल उगाने वाले किसानों को सरकार किसान सम्मान निधि और किसान पेंशन योजना के तहत खातों में सीधे पैसा भेजती है। जबकि पशुपालकों के लिए ऐसी कोई स्कीम नहीं है।
विभाग सरकार से लगातार इस बात का अनुरोध कर रहा है कि खेतिहर किसानों और पशुपालकों को बराबर का दर्जा दिया जाए। परंतु सरकार के कान में जूं नहीं रेंग रही। बजट के नाम पर सरकार डेयरी विकास पर 400-450 करोड़, पशुओं की बीमारियों की रोकथाम पर 250-300 करोड़ तथा बुनियादी ढांचे के विकास पर 100-125 करोड़ रुपये का मामूली खर्च सरकार करती है। जबकि 600-700 करोड़ रुपये पशुपालन व डेयरी विकास से जुड़े प्रतिष्ठानों व संस्थानों पर खर्च किए जाते हैं।
इसके अलावा गोवंश संवर्द्धन पर सरकार हर साल 700-800 करोड़ रुपये खर्च करती है। इस बजट में से करीब सवा चार सौ करोड़ रुपये से राष्ट्रीय गोकुल मिशन चलाया जा रहा है। इससे आप अंदाजा लगा सकते हैं कि सरकार गोवंश के संरक्षण के प्रति कितनी गंभीर है।
