बाराबंकी: अपनी बदहाली पर आंसू बहा रहा सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र

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Edited By Amrit Vichar
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बाराबंकी। वायरल फीवर के कारण मरीजों की संख्या में दोगुनी वृद्धि हो गई है तो मरीजों को इलाज मिलना मुश्किल हो रहा है। हजारों की आबादी पर एकमात्र सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र बना है। लेकिन, इस अकेले सरकारी अस्पताल में मरीजों का इलाज कराना नामुमकिन है। वजह, अस्पताल खुद ही बीमार पड़ा है। यहां पर आने …

बाराबंकी। वायरल फीवर के कारण मरीजों की संख्या में दोगुनी वृद्धि हो गई है तो मरीजों को इलाज मिलना मुश्किल हो रहा है। हजारों की आबादी पर एकमात्र सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र बना है। लेकिन, इस अकेले सरकारी अस्पताल में मरीजों का इलाज कराना नामुमकिन है। वजह, अस्पताल खुद ही बीमार पड़ा है। यहां पर आने वाले मरीजों को भारी समस्याओं का सामना करना पड़ता है। तो वहीं वार्ड में गंदे बिस्तरों पर बिना स्टैंड मरीजों को बोतलें चढाई जाती हैं। वार्ड में पंखे की भी व्यवस्था नहीं है। बावजूद इसके, स्वास्थ्य विभाग अस्पताल की सुध लेने को तैयार नहीं है।

क्षेत्र में तरह-तरह की बीमारियां फैल रही हैं। कई मामले सामने आ चुके हैं। इस समय वायरल फीवर के कारण मरीजों की संख्या में दोगुनी वृद्धि हो गई है तो मरीजों को इलाज मिलना मुश्किल हो रहा है।  डेंगू जैसी जानलेवा बीमारी के मामले भी पहले मिले हैं। लेकिन, क्षेत्र में स्वास्थ्य सुविधाओं का बुरा हाल है। हालत यह है कि सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में खून जांच तक की सुविधा नहीं है। पैथोलॉजी लैब के लिए टेक्नीशियन समेत अन्य स्टाफ भी तैनात नहीं हैं। पैथोलॉजी के नाम पर सिर्फ टीबी का बलगम टेस्ट होता है। ऐसे में, खून जांच के लिए मरीजों को प्राइवेट सेंटरों में महंगी जांच कराने को बाध्य होना पड़ता है। अस्पताल में एक्सरे मशीन है, लेकिन लाइट होने पर ही यह सुविधा उपलब्ध है।

अल्ट्रासाउंड मशीन नहीं है। सीएचसी पर वैसे तो दो महिला और 7 पुरुष चिकित्सक तैनात हैं। लेकिन यहां पर कोई विशेषज्ञ डॉक्टर तैनात नहीं हैं। 30 बेड के इस अस्पताल में बोतलें लगाने का स्टैंड पूरे वार्ड में सिर्फ पांच ही हैं। एक साथ अधिक मरीज होने पर खिड़की व दीवालों से बोतले बांधकर मरीजों को लगाई जाती हैं। वहीं पंखे सिर्फ देखने के लिए लगे हैं। वार्ड का कोई पंखा नहीं चलता है तो पूरे वार्ड में सिर्फ एक ही लाइट जलती है। जिससे दूसरी तरफ टॉर्च जलाकर वीगो लगाया जाता है और इंजेक्शन दिए जाते हैं। तो वहीं मरीजों को अस्पताल से दवाओं के नाम पर सिर्फ बुखार के टैबलेट ही मिल पाती हैं। अन्य दवाएं बाहर मेडिकल स्टोरों से खरीदनी पड़ती हैं। स्थिति यह है कि ग्लूकोज की बोतलें व आईबी सेट भी मरीजों को बाहर से खरीदनी पड़ता हैं। यह अस्पताल केवल नाम से ही सरकारी है लेकिन यहां पर सब कुछ प्राइवेट है।

जहां एक ओर मरीजों के लिए पंखे तक की व्यवस्था नहीं है वही चिकित्सक ओपीडी में अपने बैठने के लिए ए.सी लगए हुए हैं। डॉक्टर संजय गुप्ता तो ओपीडी में अपने कमरे में अतिरिक्त दरवाजा लगाए हुए हैं। यह उनके आने पर ही खुलता है। इस कमरे में बैठकर वह अपने मरीजों को देखते हैं। इसके बाद वह कमरा बंद रहता है।

आलम यह है कि अपनी सुविधा के लिए सभी चिकित्सकों ने व्यवस्था कर रखी है। लेकिन यहां पर आने वाले मरीजों को काफी परेशानियों का सामना करना पड़ता है। वार्ड में पंखा ना चलने से मरीजों को मच्छर से फैलने वाली बीमारियों का खतरा भी बना रहता है।

डॉ हेमंत गुप्ता ने बताया कि हमारे पास पर्याप्त स्टाफ है। पर्याप्त संसाधन भी हैं, लेकिन सीएचसी की जरूरत के हिसाब से डॉक्टर और स्टाफ की कमी है। दवाएं भी आवश्यकता अनुसार नहीं मिल पाती है फिर भी मरीजों को बेहतर सुविधाएं देने के प्रयास किए जाते हैं।

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