यूपी: बदले दौर में बदलीं मायावती, हर शब्द के गूढ़ मायने, पेश किया नया चेहरा
लखनऊ। चार बार प्रदेश में मुख्यमंत्री की कुर्सी संभालने वाली बसपा की राष्ट्रीय अध्यक्ष मायावती ने खुद को बदलते दौर के साथ बदल लिया है। उनकी भाषा में अब जीत की हुंकार तो है, लेकिन अभिमान और द्वेष से बचने की पूरी कोशिश भी है। शनिवार को कांशीराम स्मारक स्थल पर बोला गया उनका एक-एक …
लखनऊ। चार बार प्रदेश में मुख्यमंत्री की कुर्सी संभालने वाली बसपा की राष्ट्रीय अध्यक्ष मायावती ने खुद को बदलते दौर के साथ बदल लिया है। उनकी भाषा में अब जीत की हुंकार तो है, लेकिन अभिमान और द्वेष से बचने की पूरी कोशिश भी है। शनिवार को कांशीराम स्मारक स्थल पर बोला गया उनका एक-एक शब्द गूढ़ राजनीतिक मायने रखता है। वे बखूबी जानती हैं कि काशी, मथुरा और वाराणसी से हिंदू मानस की आस्था जुड़ी है। इसलिए उन्होंने साफ किया कि सरकार बनी तो इन शहरों के विकास का प्रवाह निरंतर रहेगा। ब्राह्मणों व मुस्लिमों की हिमायत के साथ उन्होंने यह वादा करके संतुलन साधा है।
अपने शुरूआती दौर में बसपा प्रमुख कठोर जातीय आग्रह के लिए जानी जाती थीं। 2007 में उन्होंने पहली बार सवर्ण समाज को आरक्षण दिए जाने का मुददा उठाया तो उन्हें पांच साल के लिए सूबे की सत्ता भी हासिल हुई। लेकिन इन दस वर्षों में प्रदेश की राजनीति काफी बदल गई। सांप्रदायिक ध्रुवीकरण के चलते भाजपा पूर्ण बहुमत से सत्ता में है। समाज में यह ध्रुवीकरण कहीं न कहीं अभी भी कायम है।
अनेक नाकामियों के बावजूद हिंदुत्व के प्रति योगी आदित्यनाथ का तीखा आग्रह उन्हें स्वीकार्य बनाए हुए है। उधर, बसपा जिस ब्राह्मण समाज को खुद से जोड़ने की कोशिश कर रही है, काशी, मथुरा और वाराणसी से मुंह मोड़कर उसे लुभाना भी आसान नहीं है। बसपा प्रमुख ने ये हालात भांपकर ही बड़ी सावधानी से शनिवार को विकास और राजनीतिक विद्वेष से दूर रहने के बहाने नर्म हिंदुत्व का कार्ड खेला।
बसपा प्रमुख की छवि प्रदेश में सख्त प्रशासक की भी रही है, यही उनकी टीआरपी भी है। इसलिए उन्होंने यह संदेश भी दिया कि सरकार बनी तो वे पहले की तरह कठोर प्रशासक के रूप में नजर आएंगी। बिना किसी घोषणापत्र के चुनाव रण में उतर रही बसपा ने यह भी स्पष्ट किया कि वह फ्री बिजली-पानी जैसे दावों नहीं, काम के दम पर चुनाव लड़ेगी। उन्होंने आम आदमी पार्टी को आड़े हाथों लिया और लोगों को सांप्रदायिकता से बचने की नसीहत भी दी।
कांशीराम के लिए भारत रत्न मांग बड़ा दांव
बसपा संस्थापक कांशीराम अनुसूचित जाति, जनजाति और अन्य पिछड़े वर्ग में गहरा असर रखते हैं। जो नेता बसपा की राजनीति से सहमत नहीं हैं, अन्य दलों में हैं, वे भी कांशीराम के मुरीद तो हैं ही। आमजन के बीच भी कांशीराम की छवि प्रदेश में डॉ. आंबेडकर के बाद सबसे बड़ी है। इसलिए कांशीराम को भारत रत्न देने की मांग उठाकर बसपा ने भाजपा के लिए चुनौती पेश कर दी है।
