रायबरेलीः सैकड़ों ग्रामीण कीचड़ में तलाश रहे जीविका, जानें वजह?

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रायबरेली। हाथ में कुदाल व फावड़ा लिए सैकड़ों ग्रामीण की टोली कीचड़ में अपनी जीविका के साथ-साथ लोगों के लिए सुकून व सुगंध का साधन तलाश रही है। क्षेत्र के सैकड़ों परिवारों के लिए इस समय यह कार्य जीविका का साधन बना हुआ है और लोग इस कार्य में लगे हुए है। सुनने में यह …

रायबरेली। हाथ में कुदाल व फावड़ा लिए सैकड़ों ग्रामीण की टोली कीचड़ में अपनी जीविका के साथ-साथ लोगों के लिए सुकून व सुगंध का साधन तलाश रही है। क्षेत्र के सैकड़ों परिवारों के लिए इस समय यह कार्य जीविका का साधन बना हुआ है और लोग इस कार्य में लगे हुए है। सुनने में यह बात अजीब अवश्य लगती है लेकिन यह हकीकत है। पूरे क्षेत्र में जहां भी कीचड़ भरा होता है, वहां इस समय खुदाई का काम चल रहा है और यहां की घास इतनी उपयोगी है कि आप कल्पना नहीं कर सकते है।

ऊंचाहार क्षेत्र के सैकड़ों परिवारों के लोग इस समय सुबह हाथ में कुदाल और फावड़ा लेकर निकल पड़ते है। बरसात के दिनों में जहां पानी भरा होता है वहां पर उगने वाली घास की तलाश में यह लोग कई किमी का सफर तय करते है । क्षेत्र के गांव पर्वत के पुरवा , बंधवा, अकोदिया , मुगलपुर सहित दर्जनों गांवों के ग्रामीण इस कार्य में लगे हुए है । क्षेत्र के तालाब के किनारे व छोटे छोटे गड्ढों में एक विशेष प्रकार की घास के जड़ की खोदाई करते है। इस घास को स्थानीय भाषा में कुशी व कासा कहा जाता है । दिन भर की कड़ी मेहनत के बाद जब यह ग्रामीण वापस लौटते है तो उनकी सायकिल व सिर पर बोरे में घास होती है। यह घास इस समय पानी भरे स्थान के किनारे सूखे स्थान पर पाई जाती है।

इस काम में उपयोग की जाती है यह घास

निकलने वाली घास को यहां से बड़ी संख्या में बड़े व्यवसाई खरीदकर ले जाते है । इन व्यवसायियों ने इस समय अरखा गांव के पास कैंप कर रहा है । इस घास को ले जाकर उसकी सफाई करने के बाद इसकी पेराई की जाती है । जिससे निकलने वाले रस से सुगंधित इत्र बनाया जाता है। जबकि पेराई के बाद बचने वाली घास से कूलर की घास तैयार की जाती है। जो गर्मियों में ठंडक देती है।

श्रमिकों को मिलती है अच्छी रकम

घास की खोदाई करने वाले राम किसुन बताते है कि वह रोज करीब दो से ढाई किलो घास की खोदाई करते है । उनसे कन्नौज से आए व्यापारी इस घास को तीन सौ रुपए किलो की दर पर खरीदते है । इस प्रकार से उन्हें प्रतिदिन करीब छह सौ से सात सौ रुपए रोज मिल जाता है । इसी काम में लगे सुरेश कुमार बताते है कि व्यापारी घास एकत्र करने के बाद ट्रक से कन्नौज ले जाते है । जबकि राम सुमेर का कहना है कि उनके गांव के छोटे छोटे बच्चे भी दिन भर घास की खोदाई कर रहे है ।

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