बरेली: मंडल में कुछ यूं दरकता गया कांग्रेस का किला

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ओमेन्द्र सिंह, बरेली, अमृत विचार। बरेली मंडल में कांग्रेसियों की आपसी फूट के कारण यहां कांग्रेस का किला दरकता चला गया। कभी शाहजहांपुर के स्व. जितेन्द्र प्रसाद के गढ़ कहे जाने वाले मंडल से अंतिम बार 2002 में कांग्रेस के विधायक के रूप में अंतिम बार वीरेन्द्र प्रताप सिंह मुन्ना विधानसभा पहुंचे थे। उनके बाद …

ओमेन्द्र सिंह, बरेली, अमृत विचार। बरेली मंडल में कांग्रेसियों की आपसी फूट के कारण यहां कांग्रेस का किला दरकता चला गया। कभी शाहजहांपुर के स्व. जितेन्द्र प्रसाद के गढ़ कहे जाने वाले मंडल से अंतिम बार 2002 में कांग्रेस के विधायक के रूप में अंतिम बार वीरेन्द्र प्रताप सिंह मुन्ना विधानसभा पहुंचे थे। उनके बाद शाहजहांपुर, बरेली, पीलीभीत और बदायूं से कोई प्रत्याशी कांग्रेस से विधायक नहीं बन सका। जानकारों की माने तो इसमें सबसे बड़ी वजह कांग्रेसी नेताओं की आपसी फूट रही।

यह आपसी फूट अब तक बरकरार है। यदि आपसी तालमेल की कमी रही तो इस बार भी विधानसभा का सफर कांग्रेसियों के लिए मुश्किल भरा होगा। लोकसभा की बात करें तो प्रवीन सिंह ऐरन ने अंतिमवार वर्ष 2009 में भाजपा प्रत्याशी संतोष गंगवार को हराकर यह सीट कांग्रेस के खाते में डाली थी। वहीं विधानसभा में वर्ष 2002 के बाद कोई प्रत्याशी कांग्रेस प्रत्याशी के रूप में नहीं पहुंच सका है।

राजनीति के मामले में बरेली मंडल में कांग्रेस की कभी तूती बोलती थी। इसका मुख्य कारण रहे पूर्व प्रधानमंत्री स्व. राजीव गांधी और स्व. नरसिम्हाराव के राजनैतिक सलाहकार रहे स्व. जितेन्द्र प्रसाद। बाबा साहब के नाम से मशहूर जितेन्द्र प्रसाद ने कांग्रेस की पौध को सरीके से सींचा था। यही वजह रही कि मंडल में कांग्रेस का परचम अधिकांश बार शाहजहांपुर की तिलहर विधानसभा में फहराता रहा। लेकिन उनकी मौत के बाद वर्ष 2002 में कांग्रेस ने वीरेन्द्र प्रताप सिंह मुन्ना को तिलहर से चुनाव मैदान में उतारा था।

उस वक्त बरेली मंडल के चारों जिले में कांग्रेस बुरी तरह पराजित हुई। वीरेन्द्र प्रताप सिंह मुन्ना ने यह सीट दोबारा कांग्रेस की झोली में डाल दी। उन्होंने पूर्व केंद्रीय मंत्री स्व. सत्यपाल सिंह यादव के बेटे राजेश यादव को पराजित किया था। राजेश यादव सपा से चुनाव लड़ रहे थे। इसके बाद मंडल में कोई प्रत्याशी कांग्रेस की जीत का स्वाद नहीं चखा सका।

जितिन प्रसाद भी बनेंगे कारण
वर्ष 2017 में कांग्रेस से जितिन प्रसाद तिलहर विधानसभा क्षेत्र से कांग्रेस प्रत्याशी के रूप में चुनाव मैदान में थे, लेकिन कांग्रेसियों की भितरघात और मोदी लहर के कारण जितिन प्रसाद चुनाव नहीं जीत सके। अभी कुछ माह पहले जितिन प्रसाद ने कांग्रेस का हाथ छोड़कर भाजपा का फूल पकड़ लिया है। इसका भी असर दिखाई देगा। वजह है कि आज भी जितिन के साथ ब्राह्मण और ठाकुर लॉबी है।

वर्ष दर वर्ष गिरता गया काग्रेस का ग्राफ
वर्ष 2002 में तिलहर विधानसभा क्षेत्र से वीरेन्द्र प्रताप सिंह मुन्ना ने चुनाव जीतकर सीट कांग्रेस के खाते में डाली थी। इससे पहले पुवायां से चेतराम 1993 व 1996 में कांग्रेस से विधायक बने। वहीं पीलीभीत से सैयद अली अशरफी ने वर्ष 1985 में कांग्रेस उम्मीदवार के रूप में चुनाव जीता था। इसी वर्ष भोजीपुरा से नरेन्द्र पाल सिंह ने चुनाव जीतकर सीट कांग्रेस की झोली में डाली थी। वर्ष 2002 के बाद बसपा, सपा और भाजपा का दौर शुरू हो गया।

प्रवीण सिंह ऐरन के बूते पर कांग्रेस
बरेली में कांग्रेस के प्रवीण सिंह ऐरन व उनकी पत्नी सुप्रिया ऐरन कांग्रेस की ससख्त उम्मीदवार मानी जा रही हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि बरेली विधानसभा सीट पर ऐरन दंपति मुख्य दावेदार माने जा रहे हैं। प्रवीन सिंह ऐरन ने वर्ष 2009 में बरेली से लोकसभा की सीट कांग्रेस उम्मीदवार के रूप में जीती थी।

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