‘रक्षक सेना’ की सफलता से प्रेरित होकर ह्यूम ने की थी कांग्रेस की स्थापना, जानें इतिहास
इटावा। देश की सबसे पुरानी पार्टी कांग्रेस की स्थापना उत्तर प्रदेश के इटावा में 30 मई 1857 में क्रांतिकारियों से निपटने के लिये गठित की गई ‘रक्षक सेना’ की सफलता से प्रेरित होकर की गई थी। इटावा के कलेक्टर रहे ए.ओ. ह्यूम ने 28 दिसंबर 1885 को बंबई में कांग्रेस की स्थापना अंग्रेज सरकार के …
इटावा। देश की सबसे पुरानी पार्टी कांग्रेस की स्थापना उत्तर प्रदेश के इटावा में 30 मई 1857 में क्रांतिकारियों से निपटने के लिये गठित की गई ‘रक्षक सेना’ की सफलता से प्रेरित होकर की गई थी। इटावा के कलेक्टर रहे ए.ओ. ह्यूम ने 28 दिसंबर 1885 को बंबई में कांग्रेस की स्थापना अंग्रेज सरकार के लिए सेफ्टी वाल्व के रूप में की थी। ‘इटावा के हजार साल’ पुस्तक के अनुसार इटावा के कलेक्टर ए.ओ. ह्यूम ने इटावा में 30 मई 1857 को राजभक्त जमीदारों की अध्यक्षता में राजभक्त ठाकुरों की एक स्थानीय रक्षक सेना बनाई थी।
जिसका मकसद इटावा में शांति स्थापित करना था। इस सेना की सफलता को देखते हुए 28 दिसंबर 1885 को मुबंई में ब्रिटिश प्रशासक ह्यूम ने कांग्रेस की नींव रखी। ह्यूम के दिमाग में कांग्रेस के गठन की भूमिका अंग्रेज सरकार के लिए एक सेफ्टी वाल्व की तरह थी। उनका मानना था कि वफादार भारतीयों की एक राजनीतिक संस्था के रूप में कांग्रेस के गठन से भारत में 1857 जैसे भीषण जन विस्फोट के दोहराव से बचा जा सकता था। इतिहासकारों के अनुसार वर्ष 1856 में ह्यूम इटावा के कलेक्टर थे।

डलहौजी की संधि के कारण देशी राज्यों में अपने अधिकार हनन को लेकर ईस्ट इंडिया कंपनी के विरुद्ध आक्रोश था। चर्बी लगे कारतूसों के कारण छह मई 1857 में मेरठ से सैनिक विद्रोह भड़का था। उत्तर प्रदेश और दिल्ली से लगे क्षेत्र ईस्ट इंडिया कंपनी ने संवेदनशील घोषित कर दिए। ईस्ट इंडिया कंपनी की सेना में भारतीयों की संख्या भी अच्छी-खासी थी। अंग्रेज सैनिकों ने इटावा की सडकों पर गश्त तेज कर दी थी। 16 मई 1857 की आधी रात को सात हथियारबंद सिपाही इटावा में शहर कोतवाल ने पकड़ लिए। ये मेरठ के पठान विद्रोही थे जो अपने गांव फतेहपुर जा रहे थे।
पढ़ें: संत कालीचरण महाराज पर केस दर्ज, महात्मा गांधी के खिलाफ ‘अपमानजनक’ टिप्पणी कर गोडसे को किया था सलाम
उन्होंने कमांडिंग अफसर कार्नफील्ड पर गोली चला दी, लेकिन वह बच गया। उसने बदले में गोलियां दागना शुरू कर दिया। जिसमें चार मारे गए और तीन भाग गए। पुस्तक में उल्लेख है कि डिप्टी कलेक्टर लक्ष्मण सिंह, कुंवर जोर सिंह व अन्य वफादारों ने अंग्रेज परिवारों को बढपुरा से आगरा पहुंचा दिया। इटावा के सैनिकों ने ह्यूम और उसके परिवार को मार डालने की योजना बनाई, जिसकी भनक लगते ही 17 जून 1857 को ह्यूम वेश बदलकर इटावा से निकल कर बढपुरा पहुंच गए और सात दिन तक वे बढपुरा में छिपे रहे। 25 जून 1857 को ग्वालियर से अंग्रेजों की रेजीमेंट इटावा आई और यहांपर पुन अंग्रेजों का अधिकार हो गया।
