देवरिया: रैलियों के बिना चुनाव प्रचार लग रहा “बिना बैंड-बाजे की बारात”

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Edited By Amrit Vichar
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देवरिया। उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव में कोरोना संक्रमण के खतरे को देखते हुये रैलियों और नुक्कड़ सभाओं पर लगी रोक के कारण राजनीतिक दलों का प्रचार अभियान इतना फीका लग रहा है कि लोग इसे ‘बिना बैंड बाजे की बारात’ बता रहे हैं। चुनाव आयोग द्वारा जारी कोविड प्रोटोकॉल के तहत चुनाव मैदान में …

देवरिया। उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव में कोरोना संक्रमण के खतरे को देखते हुये रैलियों और नुक्कड़ सभाओं पर लगी रोक के कारण राजनीतिक दलों का प्रचार अभियान इतना फीका लग रहा है कि लोग इसे ‘बिना बैंड बाजे की बारात’ बता रहे हैं। चुनाव आयोग द्वारा जारी कोविड प्रोटोकॉल के तहत चुनाव मैदान में उतरे उम्मीदवार बेहद सीमित दायरे में अपना प्रचार कर रहे हैं। सिर्फ वर्चुअल प्रचार और महज पांच लोगों के साथ घर घर जाकर वोट मांगने की अनुमति हाेने के कारण उम्मीदवारों के लिये भी प्रचार अभियान फीका साबित हो रहा है।

देवरिया के सेवानिवृत शिक्षक डा. सतीश चन्द्र द्विवेदी का कहना है कि पिछले चुनाव तक प्रचार अभियान की शोर गुल से भरी तपिश न सिर्फ उम्मीदवारों को बल्कि मतदाताओं को भी जोश से भर देती थी। डा द्विवेदी ने मौजूदा हालात में कोविड प्रोटोकॉल के तहत प्रचार पर प्रतिबंध को लाजिमी बताते हुये कहा कि ठंडा चुनाव प्रचार मौसम की ठंड के अहसास को बढ़ा रहा है।

देवरिया के डढ़िया गांव की 85 वर्षीय त्रिवेणी यादव का कहना है कि उन्होंने अपनी जिंदगी में ऐसा फीका प्रचार कभी नहीं देखा। हालांकि उन्होंने सीमित प्रचार अभियान को ही अनुमति देने के आयोग के फैसले की तारीफ करते हुये यह जरूर कहा कि रैलियों और नुक्कड़ सभाओं के बिना चुनाव प्रचार तो ‘बिना बैंड बाजे की बारात’ जैसा हो गया है। जैसे बिना गाजे बाजे की बारात या बिना डमरू के मदारी।

देवरिया शहर निवासी वरिष्ठ अधिवक्ता सुनील श्रीवास्तव का मानना है कि कोरोना को देखते हुए जनसभाओं पर आयोग को प्रतिबंध जारी रखना चाहिये। श्रीवास्तव ने कहा कि इस पाबंदी के सफल प्रयोग के बाद अब देश में चुनाव प्रचार के नये तौर-तरीकों का जन्म होगा। इससे भ्रष्ट तरीके अपना कर होने वाले बेहद खर्चीले चुनाव अभियानों पर लगाम लग सकेगी।

श्रीवास्तव का कहना है कि पिछले चुनाव तक प्रत्याशियों के नामों की घोषणा के साथ ही गाजे-बाजे के साथ चुनावी महासमर का आगाज हो जाता था। गाड़ियों के काफिले, समर्थकों की भीड़ और पानी की तरह चुनाव में बहने वाले बेतहाशा पैसे की खनक अब चुनाव से नदारद है। उन्होंने 22 जनवरी तक जारी कोविड प्रोटोकॉल का पालन किये जाने की उम्मीद जतायी।

वरिष्ठ पत्रकार एम पी विशारद का मानना है कि कोरोना महामारी के बीच हो रहा यह चुनाव भविष्य के लिये प्रचार के नये तरीकों का ईजाद करेगा। वर्चुअल प्रचार का तरीका कम से कम शहरी क्षेत्रों में आने वाले चुनावों में प्रचार के नये तरीकों को लोगों के बीच लोकप्रिय भी बना देगा।

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