बरेली: दीन के मामले में खानदान की, राजनीति में सिर्फ दिल की सुनेंगे
बरेली,अमृत विचार। जिले में 14 फरवरी को मतदान होना है। राजनीतिक गठजोड़ और समर्थन देने का सिलसिला चल रहा है। मुस्लिम सियासत भी इन दिनों चरम पर है। खानदान-ए-आला हजरत से निकले तीन अलग-अलग सुर इस ओर इशारा कर रहे हैं कि सुन्नी बरेलवी मसलक के मानने वालों के सबसे बड़े केंद्र से जुड़े लोग …
बरेली,अमृत विचार। जिले में 14 फरवरी को मतदान होना है। राजनीतिक गठजोड़ और समर्थन देने का सिलसिला चल रहा है। मुस्लिम सियासत भी इन दिनों चरम पर है।
खानदान-ए-आला हजरत से निकले तीन अलग-अलग सुर इस ओर इशारा कर रहे हैं कि सुन्नी बरेलवी मसलक के मानने वालों के सबसे बड़े केंद्र से जुड़े लोग ही एक राय नहीं हैं। आईएमसी प्रमुख मौलाना तौकीर रजा कांग्रेस और आरएसी के नायब सदर अदनान मियां सपा को खुला समर्थन दे चुके हैं।
सुब्हानी मियां के दामाद सैयद आसिफ मियां ने तो ओवैसी की पार्टी एआईएमआईएम से चुनाव लड़ने के लिए नामांकन दाखिल कर दिया।
खानदान के इस बिखराव से आम मुसलमान भी हैरत में हैं मगर ऐसा पहली बार भी नहीं हुआ कि खानदान से अलग-अलग राजनीतिक सोच निकलकर सामने आई हो।
लिहाजा बात करने पर पता चलता कि आला हजरत से निस्बत रखने वाले अधिकतर आम मुसलमानों के लिए दरगाह और आला हजरत खानदान से जुड़े लोग दीनी लिहाज से तो अकीदत का विषय है मगर सियासत की अगर बात होती है तो उन्हें अपना क्षेत्र, पसंदीदा प्रत्याशी और अपने स्थानीय मसले नजर आते हैं।
ज्यादातर लोगों का मानना है कि दीन के मामले में सुन्नियत के मरकज पर तो बेपनाह अकीदत है मगर उन्हें इस बात से फर्क नहीं पड़ता कि खानदान का कौन शख्स किस पार्टी को समर्थन कर रहा है। हालांकि दरगाह आला हजरत के प्रमुख सुब्हानी मियां और सज्जादानशीन मुफ्ती अहसन मियां हैं।
और इन दोनों ही लोगों की तरफ से इस बिखराव पर कोई टिप्पणी नहीं की गई है। न ही कोई राजनीतिक बयान दिया गया मगर जिन लोगों ने भी अब तक इन चुनावों में अलग-अलग राजनीतिक पार्टियों के साथ मंच साझा कर लिया है उनमें खानदान से जुड़े लोगों के ही नाम हैं। यही वजह है कि लोग सीधे तौर पर खानदान के इस बिखराव को सुन्नियत के मरकज और आम मुसलमानों से जोड़कर देख रहे हैं।
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