Valentine Week: उसकी समझदारी भरी बातों पर हार बैठी दिल, फिर… जुड़ गया जन्मों का रिश्ता

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Edited By Amrit Vichar
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रजनेश सक्सेना, बरेली। कहते हैं प्यार का कोई मजहब नहीं होता। प्यार का मजहब सिर्फ प्यार होता है… यह लाइनें सटीक बैठती हैं बरेली के एक ऐसे जोड़े पर जिसने धर्म की दीवार लांघकर प्यार का रास्ता चुना। हमारी आज की कहानी है बरेली के फतेहगंज पश्चिमी में तैनात खंड शिक्षा अधिकारी बबिता सिंह की। …

रजनेश सक्सेना, बरेली। कहते हैं प्यार का कोई मजहब नहीं होता। प्यार का मजहब सिर्फ प्यार होता है… यह लाइनें सटीक बैठती हैं बरेली के एक ऐसे जोड़े पर जिसने धर्म की दीवार लांघकर प्यार का रास्ता चुना। हमारी आज की कहानी है बरेली के फतेहगंज पश्चिमी में तैनात खंड शिक्षा अधिकारी बबिता सिंह की। बबिता के पति मुस्लिम समाज से आते हैं। जबकि वह खुद एक हिंदू परिवार की हैं। दोनों ही मूल रूप से मुरादाबाद के रहने वाले हैं। किस तरह से उन्होंने अपने प्यार को एक मुकाम तक पहुंचाया। चलिए बताते हैं बबिता की ही जुबानी…

प्यार… मेरे लिए इसका मतलब था कि लाइफ का एक ऐसा पार्टनर जो मुझे मुझसे बेहतर समझ सके। बिल्कुल मेरे टाइप का हो। मगर कभी-कभी मन में ख्याल आता कि कहां ऐसे लड़के मिलते हैं। इसी असमंजस में अभी तक मुझे कोई ऐसा लड़का नहीं मिला था। मगर एक दिन कॉम्पटीशन की कोचिंग में एक लड़का धीरे-धीरे मेरे दिल को छूने लगा। उसकी सोच और उसके विचार मुझे काफी अट्रेक्ट करने लगे। वो लड़का महिला सशक्तिकरण की बातें ज्यादा किया करता था। वह जब भी बोलता था बहुत समझदारी वाली बातें करता था। तो लगा कि यह मेरे टाइप का है। उस लड़के का नाम था मोहम्मद गौरी।

यह कहानी शुरू होती है वर्ष 2001 से
बबिता बताती हैं कि… मेरा प्यार कोई पहली नजर वाला प्यार नहीं था। 2001 में मैं कॉम्पटेटिव एग्जाम की तैयारी कर रही थी। उस वक्त मेरी उम्र करीब 21 वर्ष थी। तैयारी के लिए मैंने मुरादाबाद में ही एक कोचिंग ज्वाइन की। वहां पर मेरे कई दोस्त बने। जिसमें लड़के लड़कियां दोनों थे। एग्जाम के लिहाज से हर दिन सभी लोग ग्रुप डिस्कशन भी किया करते थे। ग्रुप में गौरी नाम का लड़का जब भी बोलता था तो वह बहुत ही समझदारी से बोलता था। वह न तो किसी धर्म के खिलाफ बोलता और न ही महिलाओं को किसी से कमजोर होने की बात करता। महिलाओं की इज्जत करने के साथ ही उनका सम्मान करना भी जनता था। मुझे गौरी की यह बात न जाने कब पसंद आने लगी और धीरे-धीरे मैं उसे पसंद करने लगी। तब से हमारी दोस्ती और ज्यादा पक्की हो गई। मगर मुझे यह नहीं पता था कि गौरी भी मुझे पसंद करने लगे हैं।

उस वक्त मोबाइल नहीं, लैंडलाइन से होती थी बात
बबिता बताती हैं कि उस वक्त सभी लोगों के पास मोबाइल नहीं हुआ करते थे। मेरे घर में लैंडलाइन फोन था। मगर गौरी एक मोबाइल का इस्तेमाल किया करते थे। इसी बीच कोचिंग का लगभग एक साल पूरा हो चुका था। कोचिंग के अंतिम समय में हम दोनों एक दिन दोस्त होने की वजह से अपने नंबर एक्सचेंज किए। मैंने उनको अपना लैंडलाइन का नंबर दिया और उन्होंने मुझे अपना मोबाइल नंबर। इसके कुछ दिन बाद ही हमारी कोचिंग पूरी हो गई। कोचिंग से निकलने के बाद मैंने 2002 में बीएड में एडमिशन लिया और गौरी ने लॉ में एडमिशन लिया। इस बीच भी हमारी बातें होती रहती थीं। चूंकि मेरा लैंड लाइन नंबर था। इसलिए घर पर उसे कोई भी रिसीव कर सकता था। इसलिए गौरी उस पर फोन बहुत कम किया करते थे। मुझे जब भी बात करनी होती थी तो में खुद ही गौरी को फोन कर लेती थी। इसी तरह से फोन पर हमारी बातें होने लगीं। इसी तरह से एक वर्ष और बीत गया और मेरा बीएड पूरा हो गया। इसके बाद में बीटीसी करने लगी और मैंने खंड शिक्षा अधिकारी के लिए फार्म भी डाल दिया था। मगर गौरी अभी भी लॉ की पढ़ाई कर रहे थे।

क दिन घर आए तो कर गए प्रपोज
मेरे परिवार में अभी तक किसी को भी नहीं पता था। सिर्फ यह पता था कि गौरी नाम का एक लड़का दोस्त है। यह बात है 2003 की… उस दिन 30 अगस्त थी। गौरी से बात हुई तो उन्होंने कहा कि वह घर आना चाहते हैं। इसके बाद मैंने भी हामी भर दी। उस दिन गौरी पहली बार मेरे घर आए। तो हम लोग कॉम्पटीशन एग्जाम की बातें करने लगे। मुझे भी इस बात को कोई अंदाजा नहीं था कि गौरी प्रपोज करने के मूड़ से आए हैं। बातों बातों में गौरी ने कहा… हम लोग अच्छे दोस्त है न? मैंने भी कहा हां बिल्कुल… इस पर गौरी बोले- क्या हम लोग हमेशा साथ रह सकते हैं? इस पर मेरे मुंह से भी हां में ही जबाव निकला। बस यही हमारा प्रपोजल था। उस दिन से हमने साथ रहने का वादा कर लिया। मगर यह बात अभी तक परिवार में किसी को भी न पता थी।

मेरी शादी की होने लगी बातें, तो बोल दिया
इस तरह से हमारा प्यार आगे बढ़ने लगा। कुछ दिनों बाद परिवार वालों ने मेरे लिए लड़का देखना शुरू कर दिया। तो लगा कि कहीं परिवार वाले रिश्ता फाइनल ही न कर दें। तो मैनें भी डरते हुए परिवार वालों से स्पष्ट कह दिया कि मैं किसी से प्यार करती हूं। उसी से शादी भी करुंगी। इस पर परिवार वालों ने पूछा कि कौन है वो…? जब मैंने गौरी का नाम बताया तो परिवार वालों को पहले तो एक साथ झटका लगा। फिर बोले- नहीं… कभी नहीं हो सकती शादी। इसके बाद उन्होंने मेरे लिए लड़का देखना और तेज कर दिया। मगर मेरा प्यार अभी भी गौरी के लिए ही था। इन्हीं सब बातों के बीच मेरा बीटीसी और गौरी का लॉ भी फाइनल हो गया। और मेरा खंड शिक्षा अधिकारी के एग्जाम की डेट आ गई। एग्जाम के बाद वर्ष 2006 में जब उसका रिजल्ट आया तो उसमें मेरा सलेक्शन हो गया था। इसी बीच लॉ फाइनल होने के बाद गौरी की जॉब भी अर्बन को-ऑपरेटिव बैंक में लग गई थी।

दोनों जॉब में पहुंचे तो महसूस होने लगी एक दूसरे की कमी
खंड शिक्षा अधिकारी में मेरा सिलेक्शन होने के बाद मुझे पहली पोस्टिंग अमरोहा में मिली। और गौरी अर्बन को-ऑपरेटिव बैंक लखनऊ में काम करने लगे। दोनों की जॉब होने की वजह से अब दूरियां महसूस होने लगी थीं। जॉब में आने के बाद मैंने भी फोन खरीद लिया था। तो अब हम दोनों फोन पर ही बातें किया करते थे। उधर, जॉब में आने के बाद ही परिवार वालों ने लड़के फाइनल करना शुरू कर दिए थे। उन्होंने काफी कोशिश की मैं शादी कर लूं। मगर मैं इस पर थी कि मुझे शादी करनी है तो सिर्फ गौरी से। उधर, गौरी के परिवार वालों को हम दोनों की शादी से कोई दिक्कत नहीं थी। इसलिए गौरी की तरफ से समस्या थोड़ी कम महसूस हो रही थी।

छोटी बहन की शादी पहले कराई
एक तरफ परिवार वालों का शादी के लिए दबाव और दूसरी तरफ मेरी जिद… इन्हीं सब के बीच मैंने एक दिन मां से कहा कि मां… आपको तो बेटियों की शादी करनी ही है। तो क्यों न पहले छोटी बहन की शादी कर दो। किसी तरह से मैंने उन्हें छोटी बहन की शादी के लिए मना लिया था। अब छोटी बहन की शादी तय हो गई। अब 2007 के आखिरी महीनों में छोटी बहन की शादी होनी थी। उधर, मैं और गौरी अब इस असमंजस में थे कि आखिर हम कैसे शादी करें। अब तक हम दोनों को यह पूरी तरह से समझ में आ चुका था कि हमारे परिवार वाले शादी के लिए नहीं मानेंगे। एक तरफ परिवार के सभी लोग छोटी बहन की शादी में व्यस्त था तो वहीं, दूसरी ओर मैंने और गौरी ने अपनी शादी के लिए कोर्ट में एप्लाई कर दिया। मैंने नवंबर 2007 में कोर्ट में एप्लाई किया। तो वहां से कोई रिप्लाई नहीं आया। हम दोनों के धर्म को देखते हुए एडीएम की तरफ से भी उसे डिले किया जा रहा था। बाद में पता चला कि इस शादी को रोकने के लिए ऊपर से भी काफी दबाव बनाया जा रहा था। मगर प्रशासन ने इसमें हमारी मदद की और करीब तीन महीने बाद 14 फरवरी को शादी की डेट दी। एडीएम ने खुद बोला कि तुम्हारे प्यार को देखते हुए ही मैनें खुद इस तारीख को चुना है।

शादी में नहीं पहुंचे परिवार वाले- सिर्फ दोस्तों की मौजूदगी रही
हमारे इस कदम से परिवार वाले कतई खुश नहीं थे। उन्होंने भी कई कोशिशें की मगर हम नहीं माने। बहराल अब वो दिन आ चुका था जिस दिन हम एक होने जा रहे थे। और वो दिन था 14 फरवरी यानि वेलेनटाइन डे का दिन। दोस्तों की मौजूदगी में हम दोनों ने कोर्ट में ही एक दूसरे से शादी कर ली और अपनी जिंदगी जीने लगे। आज मेरे दो बच्चे भी हैं। पहला बेटा है… जिसकी उम्र 10 वर्ष है और दूसरी बेटी है जिसकी उम्र अभी 4 वर्ष है। इस तरह से हमारी लव स्टोरी पूरी होती है।

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