शाहजहांपुर: समाधि में पहुंचना ही है भक्ति की चरम सीमा: कौशल
शाहजहांपुर,अमृत विचार। मुमुक्षु अमृत महोत्सव में चल रही श्रीराम कथा के पांचवें दिवस कथा व्यास विजय कौशल महाराज ने भगवान श्रीराम की लीलाओं और शिव-पार्वती प्रसंग सुनाकर श्रोताओं को गदगद किया। रामकथा सुनने के लिए महिलाओं और पुरुषों की भीड़ लगातार बढ़ती जा रही है। भीड़ का अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि लगभग …
शाहजहांपुर,अमृत विचार। मुमुक्षु अमृत महोत्सव में चल रही श्रीराम कथा के पांचवें दिवस कथा व्यास विजय कौशल महाराज ने भगवान श्रीराम की लीलाओं और शिव-पार्वती प्रसंग सुनाकर श्रोताओं को गदगद किया। रामकथा सुनने के लिए महिलाओं और पुरुषों की भीड़ लगातार बढ़ती जा रही है।
भीड़ का अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि लगभग पांच हजार श्रोताओं के लिए तैयार किए गए पंडाल के आसपास सैकड़ों महिलाएं-पुरुष बैठ रहे हैं। कथा का शुभारंभ करते हुए संत विजय कौशल ने कहा कि जब संसार में आतताई शक्तियां सिर उठाने लगती हैं, अधर्म बढ़ता है, तब प्रभु को इस धरा-धाम पर अवतार लेना पड़ता है।
शिव-पार्वती विवाह प्रसंग कथा को विस्तार देते हुए कथा व्यास ने कहा कि शिव को प्रसन्न देखकर माता पार्वती ने उनसे राम कथा श्रवण करने का आग्रह किया। पार्वती जी ने कहा प्रभु मेरे अंदर दुविधा है कि राम ब्रह्म कैसे हो सकते हैं, अगर वह ब्रह्म हैं तो मानव रूप में अवतार कैसे लिया और वह विवाह के बाद सीता जी के पीछे वन-वन में क्यों घूमें। तब शिव ने पार्वती को प्रभु राम की लीलाओं का सचित्र सजीव वर्णन सुनाया।
कौशल महाराज ने कहा कि इस प्रसंग से यह भी शिक्षा मिलती है कि महिलाओं को पति का मन देखकर और प्रसन्न होने पर ही अपनी परेशानी, समस्या बतानी चाहिए। तभी उसका हल निकल सकता है। पुरुषों को पत्नी का सर्वाधिक सम्मान करना चाहिए, क्योंकि पत्नी लक्ष्मी का रूप होती है।
कथा व्यास कहते हैं कि शिव और पार्वती दोनों प्रभु राम की लीलाओं का वर्णन करते और सुनते हुए भाव समाधि में लीन हो गए। यह भक्ति की चरम सीमा होती है। आजकल लोग समाधि लेने को ढिंढोरा पीटते हैं, ऐसा नहीं होना चाहिए। उन्होंने कहा कि हम जिस कक्षा के विद्यार्थी हैं, उसी का ज्ञान लेना चाहिए, दूसरी कक्षा का नहीं।
अर्थात जब मन भक्ति में लीन होता है, तब सांसारिक माया-मोह छोड़ देना चाहिए। प्रभु राम की कथा सुनाते समय शिव-पार्वती बिल्कुल सटे बैठे थे, लेकिन दोनों का ध्यान प्रभु की भक्ति में डूबा था। समाधि का मतलब ही यही है। जिसका ध्यान कर रहे हैं, उसी में खो जाने का समाधि कहते हैं।
भक्ति की शक्ति सर्वोच्च होती है। कथा व्यास ने कहा कि हमारी देह यानि काया परिवार के सदस्यों की सेवा में लगी हो और मन प्रभु की भक्ति में हो, इसी को भक्ति की शक्ति कहा जाता है।
उन्होंने कहा कि भले ही देह से माताएं-बहनें रसोई में रोटी बना रही हों, लेकिन मन गोविंद के चरणों में होना चाहिए। क्योंकि भक्ति देह से नहीं मन से होती है। इसी भक्ति में शिव-पार्वती लीन थे।
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