अयोध्या : कारगिल शहीद रामसूरत के जज्बे को आज भी लोग करते हैं सलाम, दिया था सर्वोच्च बलिदान
बीकापुर / अयोध्या, अमृत विचार। बीकापुर विकासखंड क्षेत्र के डेहरियावा मजरे विश्वनोहरपुर गांव के रहने वाले रामसूरत यादव कारगिल युद्ध के दौरान शहीद हो गए थे। सरहद की रक्षा करते हुए अपना सर्वोच्च बलिदान देकर कारगिल शहीद होने का दर्जा प्राप्त किया। पूरा देश 26 जुलाई को कारगिल विजय दिवस मना रहा है। रामसूरत यादव …
बीकापुर / अयोध्या, अमृत विचार। बीकापुर विकासखंड क्षेत्र के डेहरियावा मजरे विश्वनोहरपुर गांव के रहने वाले रामसूरत यादव कारगिल युद्ध के दौरान शहीद हो गए थे। सरहद की रक्षा करते हुए अपना सर्वोच्च बलिदान देकर कारगिल शहीद होने का दर्जा प्राप्त किया।
पूरा देश 26 जुलाई को कारगिल विजय दिवस मना रहा है। रामसूरत यादव ने सीमा पर देश की रक्षा करते हुए वीरगति पाई थी। अपनी शहादत के जरिए वीर सपूत ने क्षेत्र का नाम रोशन किया है। विश्वनोहर पुर गांव में 12 दिसंबर 1968 को जन्मे राम सूरत यादव का रुझान शुरू से ही सेना में भर्ती होकर भारत मां की सेवा करने का था। स्नातक की परीक्षा के दौरान ही सेना में भर्ती होकर 1987 में पहली प्रारंभिक ट्रेनिंग नासिक में किया। सियाचिन, हिमाचल प्रदेश, सिकंदराबाद, महाराष्ट्र और असम में सेना में रहकर सरहद की रक्षा की।
रामसूरत यादव को कारगिल युद्ध के दौरान ही असम में उल्फा उग्रवादियों से लोहा लेने के लिए भेजा गया था, लेकिन वीर सपूत 12 अगस्त 1999 को 38 वर्ष की उम्र में देश सेवा करते हुए शहीद हो गया। बाद में उन्हें कारगिल शहीद का दर्जा मिला। 13 वर्ष तक उन्होंने सेना में देश की रक्षा की। 16 अगस्त को उनका पार्थिव शरीर उनके पैतृक गांव विश्वनोहर पुर बीकापुर पहुंचा। गांव में ही घर के समीप उनका अंतिम संस्कार किया गया। वहां पर बना कारगिल शहीद रामसूरत का स्मारक आज भी गांव और क्षेत्र को गौरवान्वित करता है।
कारगिल शहीद रामसूरत यादव के छोटे भाई राम मूरत यादव ने बताया कि उनके भाई रामसूरत यादव की पुण्यतिथि 16 अगस्त को शहीद स्मारक पर मनाई जाती है।
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