कानपुर: क्रांति का गवाह जुरिया से निकले 13 फ्रीडम फाइटर
कानपुर। शहर के आरएस पुरम निवासी पूर्व विधायक नेकचंद पांडेय जिस क्रांतिकारी शिवराम पांडेय के पुत्र हैं, उनपर कानपुर को नाज़ है। सीमांत गांधी के नाम से प्रख्यात खान अब्दुल गफ्फार खान खुद चलकर शिवराम पांडेय से मिलने उनके घर जुरिया पहुंचे थे और उन्होंने बरगद का पौधा रोपा था जो आज भी लोगों को …
कानपुर। शहर के आरएस पुरम निवासी पूर्व विधायक नेकचंद पांडेय जिस क्रांतिकारी शिवराम पांडेय के पुत्र हैं, उनपर कानपुर को नाज़ है। सीमांत गांधी के नाम से प्रख्यात खान अब्दुल गफ्फार खान खुद चलकर शिवराम पांडेय से मिलने उनके घर जुरिया पहुंचे थे और उन्होंने बरगद का पौधा रोपा था जो आज भी लोगों को छाया देता है। नेकचंद ने क्रांतिकारी शिवराम पांडेय की बाबत काफी जानकारी दी।
कानपुर देहात के झींझक के निकट बसा जुरिया गांव क्रांतिकारियों का तीर्थ माना जाता है। जनपद शिवराम पांडेय का बड़ा नाम रहा है। देश के आज़ाद होते ही लोकतांत्रिक प्रक्रिया में चुनाव हुए तो 1952 में कांग्रेस ने उन्हें प्रत्याशी बनाया। वह दो बार विधायक चुने गए थे।
उनके पुत्र नेकचंद पांडेय बताते हैं कि स्वतंत्रता संग्राम उनके पिता के किस्से लोग आज भी बहुत रोचक ढंग से सूनते सुनाते हैं। नेकचंद अपने पिता का स्वतंत्रता में योगदान पर एक पुस्तक तैयार कर रहे हैं। उनका कहना है कि ये कथाएं पीढ़ी दर पीढ़ी पढ़ी सुनी जाएंगी। क्रांतिकारी शिव राम पांडे इलाहाबाद विश्व विद्यालय से स्नातक की पढ़ाई पूरी करने के उपरांत स्वतन्त्र्ता संग्राम मे कूद गए। कानपुर से क्रांति की गतिविधियों के संचालन के लिए उन्हें चुना गया था।
वह गांव के बाहर एक स्थान का चयन कर वहां से सिविल नाम से क्रांतिकारियों एवम् सेनानियों का नियमित प्रशिक्षण देते रहें जिसमें प्रदेश के अनेक सेनानियों ने हिस्सा लिया। धीरे धीरे जुरिया गांव स्वतन्त्र्ता आंदोलन का केंद्र बन गया।
हालांकि गांव बहुत छोटा था उस समय आबादी तीन सौ के करीब थी। लेकिन इस गांव के तेरह स्वतंत्रता सेनानियों ने जेल यात्राएं की। खुद शिवराम पांडेय छह बार जेल गए।आंदोलन के नेतृत्व से प्रभावित होकर भारत रत्न बादशाह खान अब्दुल गफ्फार खां 1935 में पैदल उनसे मिलने घर आए। प्रशिक्षण केंद्र सिविल पर बरगद का पेड़ उन्होंने लगाया।
