मां से एक सीख को सफलता का मूलमंत्र मानते थे जगदीप

Amrit Vichar Network
Edited By Amrit Vichar
On

मुंबई। बॉलीवुड में अपने लाजवाब कॉमिक अभिनय से दर्शकों के दिलों पर राज करने वाले जगदीप मां की एक सीख को सफलता का मूलमंत्र मानते थे। जगदीप ने अपने शुरूआती दिनों में बेहद मुश्किलों का सामना किया लेकिन कभी हार नहीं मानी और संघर्ष कर फिल्म इंडस्ट्री में सशक्त पहचान बनाई। जगदीप ने एक इंटरव्यू …

मुंबई। बॉलीवुड में अपने लाजवाब कॉमिक अभिनय से दर्शकों के दिलों पर राज करने वाले जगदीप मां की एक सीख को सफलता का मूलमंत्र मानते थे। जगदीप ने अपने शुरूआती दिनों में बेहद मुश्किलों का सामना किया लेकिन कभी हार नहीं मानी और संघर्ष कर फिल्म इंडस्ट्री में सशक्त पहचान बनाई। जगदीप ने एक इंटरव्यू में अपनी मां के द्वारा कहे गए शेर का जिक्र किया था और बताया था कि कैसे उस शेर ने उन्हें कभी हारने नहीं दिया।

मां ने कहा था…….

जगदीप ने कहा था कि मैंने जिंदगी से बहुत कुछ सीखा है। मेरी मां ने मुझे समझाया था। एक बार बॉम्बे में बहुत तेज तूफान आया था। सब खंभे गिर गए थे। हमें अंधेरी से जाना था। उस तूफान में हम चले जा रहे थे। एक टीन का पतरा आकर गिरा और मेरी मां के पैर में चोट लगी। बहुत खून निकल रहा था। ये देख मैं रोने लगा, तो मेरी मां ने तुरंत अपनी साड़ी फाड़ी और उसे बांध दिया। तूफान चल रहा था, तो मैंने कहा कि यहीं रुक जाते हैं, ऐसे में कहां जाएंगे, तो उन्होंने एक शेर पढ़ा था। मां ने कहा था, वो मंजिल क्या जो आसानी से तय हो वो राह ही क्या जो थककर बैठ जाये। पूरी जिंदगी मुझे ये ही शेर समझ में आता रहा कि वो राह ही क्या जो थककर बैठ जाए तो अपने एक-एक कदम को एक मंजिल समझ लेना चाहिए। छलांग नहीं लगानी चाहिए, गिर जाओगे।”

पहली फिल्म के लिये जगदीप को मिले थे छह रुपए

बॉलीवुड में अपने कॉमिक अभिनय से पांच दशक से अधिक समय तक दर्शकों को मंत्रमुग्ध करने वाले जगदीप को अपनी पहली फिल्म के लिये छह रुपये मिले थे। मध्यप्रदेश के दतिया में जन्में जगदीप उर्फ सैयद इश्तियाक अहमद जाफरी ने बचपन के दिनों में गरीबी काफी करीब से देखी थी। जगदीप महज सात-आठ साल के थे तभी पिता का निधन हो गया। भारत-पाक बंटवारे के बाद जगदीप अपनी मां के साथ ग्वालियर से मुंबई आ गये। कहा जाता है कि जगदीप की मां यतीम खाने में खाना बनाने का काम करतीं जिससे वह अपने बच्चे को पढ़ा-लिखा सके और उसे पाल सके। एक दिन जगदीप ने निश्चय किया कि घर की परिवार की मदद के लिये उन्हें कुछ काम करना चाहिये। हालांकि, मां ने जगदीप को काम करने से मना किया लेकिन वह नहीं माने। जगदीप पढ़ाई छोड़कर पतंगें बनाने लगे, साबुन और कंघी बेचने का काम करने लगे।

जगदीप जहां सड़क पर काम किया करते थे। वहां एक आदमी आया और वह वैसे बच्चों को ढूंढ रहा था जो फिल्म में काम कर सके। उस शख्स ने जगदीप से फिल्मों में काम के बारे में पूछा कि क्या तुम काम करोगे। जगदीप ने उस शख्स से पूछा कि ये फिल्में क्या होती हैं। जगदीप ने उस समय तक फिल्में नहीं देखी थी। जगदीप ने उस शख्स से पैसे की बात की उन्हें इस काम के लिए कितने मिलेंगे। जिसपर जवाब आया तीन रुपये।

जगदीप को महसूस हुआ कि जैसे उनकी लॉटरी लग गयी है। जगदीप तुरंत फिल्मों में काम के लिए तैयार हो गए। अगले दिन जगदीप की मां उन्हें लेकर स्टूडियो पहुंच गईं, जहां बच्चों का ही सीन चल रहा था। हालांकि, उस वक्त जगदीप को केवल चुपचाप बैठने वाला रोल मिला था, लेकिन तभी उर्दू में एक ऐसा डायलॉग आया, जिसे कोई बच्चा बोल नहीं पा रहा था। जगदीप ने किसी बच्चे से पूछा कि यदि यह डायलॉग मैंने बोल दिया तो क्या होगा, जवाब आया, पैसे ज्यादा मिलेंगे छह रुपये। जगदीप ने सामने जाकर यह डायलॉग बड़ी ही खूबसूरती से बोल दिया और फिर यहीं से शुरू हुआ उनकी चाइल्ड आर्टिस्ट का सफर। यह फिल्म थी वर्ष 1951 में प्रदर्शित बी. आर. चोपड़ा की ‘अफसाना’। इसके बाद जगदीप ने सफलता की बुलंदियों को छुआ और एक से बढ़कर एक फिल्मों में अपने लाजवाब कॉमिक अभिनय से दर्शकों को दिल जीता।

जगदीप ने जावेद अख्तर से सीखी थी भोपाली भाषा

फिल्म ‘शोले’ में निभाये किरदार ‘सूरमा भोपाली’ के जरिये खास पहचान बनाने वाले हास्य अभिनेता जगदीप ने भोपाली भाषा सुप्रसिद्ध गीतकार-शायर जावेद अख्तर से सीखी थी। वर्ष 1975 में प्रदर्शित रमेश सिप्पी निर्देशित फिल्म ‘शोले’ में जगदीप ने ‘सूरमा भोपाली’ का किरदार निभाया, जो उनकी पहचान बन गया। फिल्म ‘शोले’ में जगदीप का बोला गया संवाद ‘हमारा नाम सुरमा भोपाली ऐसई नई हे’ काफी मशहूर हुआ। आज भी फैन्स के बीच जगदीप सूरमा भोपाली के नाम से मशहूर हैं। इस किरदार की कहानी भी बड़ी रोचक है।

जगदीप ने एक बार बताया था, वह फिल्म ‘सरहदी लुटेरा’ में एक कॉमेडियन के तौर पर काम कर रहे थे। फिल्म में सलमान खान के पिता सलीम खान हीरो थे। फिल्म में जगदीप के डायलॉग काफी बड़े थे और वह इस बात को लेकर वह फिल्म निर्देशक के पास पहुंचे और कहा मेरे डायलॉग बहुत बड़े हैं, तो उन्होंने कहा जाओ जाकर जावेद को बताओ। फिर वह जावेद के पास पहुंचे।

जावेद अख्तर जो फिल्म में क्लैपर बॉय थे उन्होंने डायलॉग को छोटा कर दिया। जावेद के इस काम से जगदीप काफी प्रभावित हुए और उन्होंने कहा, कमाल है यार, तुम तो बहुत अच्छे रायटर हो। इसके बाद जगदीप और जावेद एक शाम साथ बैठे थे। किस्से, कहानियां और शायरियों का दौर चल रहा था, तभी जावेद ने कहा ,क्या जाने, किधर कहां-कहां से आ जाते हैं’ तो जगदीप ने कहा ये क्या है और कहां से ले आए हो। इस पर जावेद ने कहा कि ये भोपाल का लहजा है। जगदीप ने पूछा कि यहां भोपाल से कौन है। मैंने तो ये लाइन किसी से नहीं सुनी, तो जावेद ने कहा कि ये भोपाल की औरतों का लहजा है, वे इसी लहजे में बात करती हैं, इस पर जगदीप ने जावेद से कहा कि मुझे ये भाषा सिखाओ।

रमेश सिप्पी जब फिल्म शोले’ बना रहे थे तब उन्होने जगदीप को फोन किया उनके लिए इस फिल्म में एक रोल है और फिर यहीं से शुरू हुआ ‘सूरमा भोपाली’ का सिलसिला, और लोग जगदीप को उनके असली नाम से कम और ‘सूरमा भोपाली’ के नाम से ज्यादा जानने लगे। वर्ष 1988 में जगदीपएक बार फिर सूरमा भोपाली के किरदार में नजर आये। जगदीप ने सूरमा भोपाली का निर्देशन किया। फिल्म में अमिताभ बच्चन ,धर्मेन्द्र एवं रेखा ने अतिथि भूमिका निभायी थी।

 

 

संबंधित समाचार

टॉप न्यूज