जुर्म की दुनिया का बादशाह आठ दिन में ढेर
अमित सिंह, लखनऊ। उत्तर प्रदेश के कानपुर बिकरू गांव से 1990-92 में शुरू हुआ विकास दुबे के आतंक का सफर आठ दिनों में समाप्त हो गया। दो जुलाई कानपुर बिकरू गांव में हुए मुठभेड़ में विकास दुबे ने अपने गुर्गों के साथ सीओ सहित आठ पुलिस कर्मियों की हत्या कर दी। इसके अलावा सात पुलिसकर्मी …
अमित सिंह, लखनऊ। उत्तर प्रदेश के कानपुर बिकरू गांव से 1990-92 में शुरू हुआ विकास दुबे के आतंक का सफर आठ दिनों में समाप्त हो गया। दो जुलाई कानपुर बिकरू गांव में हुए मुठभेड़ में विकास दुबे ने अपने गुर्गों के साथ सीओ सहित आठ पुलिस कर्मियों की हत्या कर दी। इसके अलावा सात पुलिसकर्मी गंभीर रूप से घायल हो गए। मगर यही जघन्य अपराध विकास दुबे के लिए काल बन गया। विकास दुबे सिर्फ कानपुर ही नहीं, बल्कि देश में भी कुख्यात अपराधी बन गया।
शहीदों का बदला लेने और गैंगस्टर विकास का खात्मा करने के लिए सरकार ने यूपी पुलिस को पूरी छूट दे दी। सरकार ने पुलिस से यह भी कह दिया कि किसी भी स्तर से विकास का खात्मा होना चाहिए। फिर क्या था, यूपी पुलिस ने विकास और उसके साथियों को खात्मा करने के लिए विशेष अभियान चला दिया। एक-एक कर विकास के साथियों को पुलिस ने एनकांटर में मार गिराया।
आठ दिनों में पुलिस ने विकास के साथ ही उसके दाहिना हाथ रहे अमर दुबे, प्रभात मिश्रा, मामा सहित पांच बदमाशों को मार गिराया। इन आठ दिनों में पुलिस प्रशासन की ओर से उसके साम्राज्य के खात्मे के लिए कानपुर के किले नुमे घर (जिसके अंदर बंकर तक बना था, जहां अवैध हथियारों का जखीरा मिला) और कई बड़ी गाड़ियों को भी बुल्डोजर से ध्वस्त करा दिया गया। इस दौरान पुलिस ने विकास को आर्थिक रूप से खत्म करने के लिए भी काम किया और उसके काले धन को सफेद करने वाले एक साथी को धर दबोचा।
विकास को दबोचने पुलिस ने कोई कोर कसर नहीं छोड़ना चाहती थी। गिरफ्तारी के लिए पूरे प्रदेश में सर्च अभियान को चलाया गया। इस अभियान में 40 टीमें, एक हजार से अधिक दारोगाआों और हजारों पुलिस कर्मियों को लगाया गया था। इतना ही नहीं देश के आधा दर्जन राज्यों की पुलिस से सहयोग मांग सपर्क भी साधा गया।
विकास दुबे ने तीन दशक तक जुर्म की दुनिया में कैसे चलाया सिक्का
फिरौती, प्रॉपर्टी डीलिंग, वसूली और कई अन्य गैरकानूनी तरीकों से पैसे कमाने वाला विकास दुबे शातिर अपराधी था। जानकारों का कहना है कि लगभग हर फैक्ट्री से विकास को चढ़ावा भेजा जाता था। नामी फैक्ट्रियों से उसे सालाना चंदा मिलता था। विकास की कमाई का दूसरा बड़ा जरिया विवादास्पद संपत्ति को खरीदना था।
बताया गया कि विकास का नाम यूपी के टॉप 25 अपराधियों की सूची में भी नहीं था लेकिन कानपुर शूटआउट के बाद वह उत्तर प्रदेश का मोस्ट वॉन्टेड अपराधी बन गया है। बताया जाता है कि चौबेपुर थाने की पुलिस उसकी गुलाम थी और किसी भी केस में पुलिस गांव नहीं आई। मामूली सी बात पर ही वह बच्चों से लेकर बुजुर्गों को बेरहमी से पीटता था। हाथ-पैर तोड़ना उसके लिए मामूली बात थी।
कुछ महीने पहले गांव के रामबाबू यादव की जमीन उसने जबरदस्ती नीलाम करवा दी थी। ग्रामीण बताते हैं कि 1992 में गांव में सांप्रदायिक हिंसा हुई थी। विकास ने यहां खूब कहर बरपाया था। कई लोग अपनी याददाश्त खो बैठे। कई सदमे में चल बसे। कुछ ऐसे बुजुर्ग अब भी गांव में मौजूद हैं। 1990 के दशक का शुरुआती समय।
देश की राजनीति में ये मंडल-कमंडल का दौर था। लेकिन यूपी के कानपुर देहात में ये बंजर पड़ी जमीन को कब्जाने का दौर था। मुलायम सिंह यादव और कांशीराम उत्तर प्रदेश की राजनीति में पैर जमा चुके थे। और उनकी छाया में पिछड़े समाज के कई इलाकाई नेता तेजी से उभरे और विधायक-सांसद बने। इस दौरान इन नेताओं पर खाली पड़ी बंजर जमीन कब्जाने का आरोप भी लगा।
विकास पर सबसे पहले नजर पड़ी पूर्व विधायक नेकचंद्र पांडे की। विकास मारपीट करता, छोटे-मोटे अपराध करता, रंगदारी वसूलने के लिए लोगों को धमकाता और पुलिस पकड़ कर थाने ले जाती, फिर छोड़ देती। धीरे-धीरे इसने 4-5 लोगों की अपनी गैंग बनाई। नाम रखा बुलेट गैंग।
1990 में ही बिकरू गांव के झुन्नाबाबा का कत्ल हो गया। कहते हैं कि ये कत्ल विकास दुबे ने ही कराया था। झुन्नाबाबा की 18 बीघे की जमीन पर कब्जे के लिए। मामले में रिपोर्ट भी दर्ज हुई। लेकिन बाद में वापस ले ली गई। यहीं से विकास चौबेपुर विधानसभा से चुनाव लड़ने वाले हरिकिशन श्रीवास्तव का हाथ थाम लेता है।
1996 में हरिकिशन श्रीवास्तव बसपा से विधानसभा का चुनाव लड़े। सामने थे बीजेपी के संतोष शुक्ला। रिजल्ट आया तो हरिकिशन श्रीवास्तव 1200 वोटों से चुनाव जीत गए। पूर्व मंत्री संतोष शुक्ला और विकास दुबे की सीधी लड़ाई नहीं थी। 1996 में संतोष शुक्ला जिलाध्यक्ष हुआ करते थे। तब लल्लन बाजपेयी को उन्होंने ही शिवली नगर पंचायत अध्यक्ष चुनाव का बीजेपी टिकट दिया था। चुनाव हुआ। लल्लन बाजपेयी चेयरमैन हो गए। लल्लन बाजपेयी नेता हुए तो उनकी शह पर इलाके में उगाही शुरू हो गई। इस उगाही को लेकर लल्लन बाजपेयी और विकास दुबे में विवाद शुरू हो गया। कई बार मारपीट हुई।
12 अक्टूबर 2001 को विकास दुबे ने लल्लन बाजपेयी के यहां हमला कर दिया। लल्लन बाजपेयी थे बीजेपी के आदमी। लल्लन बाजपेयी ने उस समय के राज्यमंत्री संतोष शुक्ला को फोन किया कि इन लोगों ने हमें घेर लिया। 12-15 लोग हैं। हथियार के साथ। संतोष शुक्ला ने कहा कि हम आ रहे हैं। वो पहले शिवली थाने गए कि फोर्स लेकर जाएंगे। शिवली थाने पर विकास दुबे और उसके लोग आ गए। थाने के अंदर दोनों के बीच बहस हुई। बात बढ़ी और संतोष शुक्ला पर विकास दुबे ने गोली चला दी।
