आपदाओं पर नियंत्रण
नेपाल में तबाही के बाद भी भूकंप का खतरा थम नहीं रहा है।
नेपाल में तबाही के बाद भी भूकंप का खतरा थम नहीं रहा है। हिमाचल प्रदेश के मंडी से 27 किलोमीटर उत्तर पश्चिम में बुधवार की रात भूकंप के झटके महसूस
नेपाल में तबाही के बाद भी भूकंप का खतरा थम नहीं रहा है। हिमाचल प्रदेश के मंडी से 27 किलोमीटर उत्तर पश्चिम में बुधवार की रात भूकंप के झटके महसूस किए गए हैं। भूकंप के झटके पंजाब तक महसूस किए गए। देश में एक सप्ताह में तीसरी बार भूकंप आया है। यूपी, उत्तराखंड, दिल्ली-एनसीआर और मध्य प्रदेश में इस महीने भूकंप के झटके लगे थे। दिल्ली-एनसीआर में 12 नवंबर को भूकंप आया था।
साथ ही उत्तराखंड व उत्तर प्रदेश में दो बार भूकंप के झटके महसूस किए गए। इससे पहले बुधवार, 9 नवंबर को भी झटके महसूस किए गए थे। नेपाल में 6.3 की तीव्रता वाले भूकंप के बाद पिछले बुधवार को तड़के दो बजे लखनऊ और मध्य उत्तर प्रदेश के अन्य हिस्सों में तेज झटके महसूस किए गए थे।
हालांकि बुधवार को हिमाचल प्रदेश में ज्यादा तीव्रता का भूकंप नहीं आया है लेकिन हिमाचल प्रदेश के कुल्लू, मंडी, कांगड़ा समेत कई और इलाके भूकंप को लेकर काफी संवेदनशील क्षेत्र में आते हैं। इलाके में कई विनाशकारी भूकंप आ चुके हैं। संवेदनशीलता के अनुसार भारत को पांच जोनों में बांटा गया है। इनमें सर्वाधिक संवेदनशील जोन ‘पांच’ माना जाता है जिसमें सिंधु से लेकर ब्रह्मपुत्र का संपूर्ण भारतीय हिमालय क्षेत्र है।
वैसे देखा जाए तो अफगानिस्तान से लेकर भूटान तक का संपूर्ण हिमालयी क्षेत्र भारतीय उपमहाद्वीप के उत्तर में यूरेशियन प्लेट के टकराने से भूगर्भीय हलचलों के कारण संवेदनशील है। इनके अलावा रन आफ कच्छ भी इसी जोन में शामिल है। भूगर्भीय संरचना के मुताबिक हिमालय क्षेत्र, पूर्वोत्तर राज्य और कच्छ जोन-5 में आते हैं, जिसे सबसे ज्यादा खतरे वाला इलाका समझा जाता है। दिल्ली सहित उत्तर भारत का पूरा तराई क्षेत्र जोन-4 में आता है। इतिहास बताता है कि भूचालों से जितना नुकसान कम संवेदनशील ‘जोन चार में होता है, उतना जोन पांच में नहीं होता।
इन दोनों इलाकों में भूकंप से निपटने के लिए पूरी एहतियाती तैयारी रहनी चाहिए। दरअसल भूकंप, बाढ़, हिमस्खलन, भूस्खलन या आकाशीय बिजली गिरने जैसी घटनाएं प्राकृतिक होती हैं और प्रकृति के नियमों के अनुसार ये होती ही रहती हैं। प्राकृतिक घटनाओं को हम अपनी लापरवाही और अज्ञान के कारण आपदा बनाते हैं। देखा जाए तो हमने अभी लातूर तथा भुज की भूकंपीय आपदा से सबक नहीं सीखा।
सिन्धु से लेकर ब्रह्मपुत्र के बीच के सभी राज्यों में अब परंपरागत भवन निर्माण शिल्प के बजाय मैदानी इलाकों की नकल से सीमेंट कंक्रीट के मकान बन रहे हैं,जो कि भूकंपीय दृष्टि से बेहद खतरनाक हैं। हिमालयी गांवों में सीमेंट कंक्रीट के जंगल उग गए हैं। आपदाओं पर नियंत्रण के लिए हमें स्वयं को प्रकृति के अनुरूप ढालना होगा।
