बरेली: कोरोना ने मजदूर को बनाया बेबस, बच्ची के दूध के लिए बेचना पड़ा खून
रजनेश सक्सेना, बरेली। वैश्विक महामारी (कोविड-19) ने दैनिक मजदूरी करने वालों के लिए मुश्किलें खड़ी कर दी हैं। दो माह लागू लाकडाउन ने मजदूरों की कमर ऐसी तोड़ी कि परिवार के लिए दो वक्त की रोटी का जुगाड़ करना मुश्किल हो गया था। बच्चों को दवा-दूध का इंतजाम करने के लिए बहुत कुछ सहना पड़ा। …
रजनेश सक्सेना, बरेली। वैश्विक महामारी (कोविड-19) ने दैनिक मजदूरी करने वालों के लिए मुश्किलें खड़ी कर दी हैं। दो माह लागू लाकडाउन ने मजदूरों की कमर ऐसी तोड़ी कि परिवार के लिए दो वक्त की रोटी का जुगाड़ करना मुश्किल हो गया था। बच्चों को दवा-दूध का इंतजाम करने के लिए बहुत कुछ सहना पड़ा। बच्चों की तड़प के आगे कई मजदूरों का दिल ऐसा पिघला कि कुछ ने सरकारी राशन बेचकर रोटी का इंतजाम किया तो कुछ ने जेवर गिरवी रखे। एक मजदूर ने अपनी बच्ची की जिंदगी बचाने को अपना खून ही बेच दिया।
अनलाक-2 के दौरान का अब यह मामला सामने आया है। रेलवे जंक्शन पर मजदूरी करने वाले एक व्यक्ति ने बच्ची के इलाज के लिए तीन हजार रुपये में एक बोतल खून बेचा था। उन रुपयों से बच्ची का इलाज कराने के साथ दूध का भी इंतजाम किया। मजदूर रामस्वरूप (परिवर्तित नाम) ने सोमवार को जब लाकडाउन के दौरान की आपबीती सुनाई तो उसकी आंखों से आंसू छलक पड़े। बताया कि उसके पांच बच्चे हैं। पत्नी के अलावा बूढ़ी मां और एक बड़ा भाई (मानसिक रूप से कमजोर) भी है।
9 मार्च को उसके घर में बेटी का जन्म हुआ था। नामकरण के दो दिनों बाद ही लाकडाउन लग गया। जहां वह काम करता था, वहां भी काम से हाथ धो बैठा। ऐसे में उसके सामन घर खर्च के साथ दुधमुंही बच्ची को दूध पिलाने का संकट आ गया। किसी तरह उधार मांगकर एक महीना काटा। एक दिन उसकी बेटी भूख से तड़प रही थी। दूध खरीदने के लिए पैसे नहीं थे।
अप्रैल माह में उसके एक रिश्तेदार को खून की जरूरत पड़ी। उस दौरान उसे भी रुपयों की जरूरत थी तब उसने बच्ची की खातिर तीन हजार रुपये में एक बोतल खून रिश्तेदार को डोनर के रूप में दिया। रिश्तेदार ही उसके घर आए और उसे बाइक पर बैठाकर एक अस्पताल तक ले गए थे।
प्रशासन से मदद मांगने को फोन करने के लिए भी नहीं थे रुपये
मजदूर के खून बेचने की बात जब मुख्य वाणिज्य निरीक्षक (सीएमआई) संजीव दुबे को मालूम हुई तो उन्होंने रामस्वरूप को अपने कक्ष में बुलाया और पूरी बात पूछी। मजदूर ने उन्हें बताया कि उसके पास फोन करने केलिए भी पैसे नहीं थे, वह कैसे मदद मांगता। सीएमआई संजीव दुबे का कहना है कि उन्हें इस बारे में पहले पता चलता तो मजदूर को ऐसा करने से रोकने के साथ उसकी मदद करवाते।
