मुरादाबाद : 'तुम्हारे संग मैं भी चलूंगी पिया, जैसे पतंग संग डोर...'

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Edited By Amrit Vichar
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टीएमयू में सितार-सारंगी और तबले का अद्भुत संगम, ऑडिटोरियम में 60 मिनट के जादुई संगीत ने बनाई अविस्मरणीय सांझ

सिर चढ़कर बोला उस्ताद पंडित शुभेंद्र राव के सितार, उस्ताद मुराद अली की सारंगी और उस्ताद अकरम खां के तबले की जुगलबंदी का जादू

मुरादाबाद,अमृत विचार। तीर्थंकर महावीर यूनिवर्सिटी के ऑडिटोरियम का यह दिन संगीत प्रेमियों के लिए अविस्मरणीय रहेगा। लगभग एक घंटे के वाद्य यंत्र-सितार, सारंगी और तबला के अद्भुत संगम पर ऑडिटोरियम में मौजूद सैकड़ों मेहमान और मेजबान वाह उस्ताद, वाह उस्ताद कहने को विवश हो गए।

राग भीम प्लासी, तीन ताल और एक ताल की प्रस्तुतियों पर ऑडिटोरियम तालियों की गड़बड़ाहट से गूंज उठा। अंत में मिश्र खमाज ने संगीत की गहराइयों में उतार दिया। तुम्हारे संग मैं भी चलूंगी पिया, जैसे पतंग संग डोर... डगर बिच कैसे चलूं पग रोकें कैसे चलूं कन्हैया के पीछे...सरीखे लोकगीत को जैसे ही खेमटा ताल में पिरोया टीएमयू झूम उठा। इससे पूर्व कुलाधिपति सुरेश जैन, ग्रुप वाइस चेयरमैन मनीष जैन, एक्जीक्यूटिव डायरेक्टर अक्षत जैन, कुलपति प्रोफेसर रघुवीर सिंह, रजिस्ट्रार डा. आदित्य शर्मा, एसोसिएट डीन प्रोफेसर मंजुला जैन, डीन स्टूडेंट वेलफेयर प्रो. एमपी सिंह ने संयुक्त रूप से मां सरस्वती के समक्ष दीप प्रज्ज्वलित करके परम्परा-दो का शंखनाद किया।

अंत में कुलाधिपति सुरेश जैन ने सितार वादक पंडित शुभेंद्र राव, कुलपति प्रोफेसर रघुवीर सिंह ने सारंगी वादक उस्ताद मुराद अली खां और एक्जीक्यूटिव डायरेक्टर अक्षत जैन ने तबला वादक उस्ताद अकरम खां को स्मृति चिन्ह देकर और शाल ओढ़ाकर सम्मानित किया। कार्यक्रम का संचालन फैकल्टी विपिन चौहान और सुगंधा जैन ने किया।

उल्लेखनीय है, सारंगी वादक उस्ताद मुराद अली खां मुरादाबाद घराने, जबकि तबला वादक उस्ताद अकरम खां मेरठ घराने से ताल्लुक रखते हैं। राग भीम प्लासी से संगीत की इस संध्या की शुरूआत हुई। जैसे ही पंडित शुभेंद्र राव ने अपनी अंगुलियों से सितार के सुरों को छेड़ा वैसे पिन ड्राप साइलेंट ऑडिटोरियम में सुरों की वर्षा होने लगी। बगल में बैठे उस्ताद मुराद अली अपनी सारंगी से जुगलबंदी करने लगे। इस जुगलबंदी ने श्रोताओं के दिलों के तारों को झंकृत कर दिया। दस मिनट तक अलाप और जोड़ अलाप से श्रोता संगीत की इस महफिल में डुबकी लगाते नजर आए।

पंडित शुभेंद्र राव बोले- सुर और साज हमारी धरोहर

सितार वादक पंडित शुभेंद्र राव ने मिश्र खमाज से पहले सारंगी वादक उस्ताद मुराद अली खां की पीठ थपथपाते हुए श्रोताओं से कहा कि आपने हमें संजीदगी से सुना, आपका शुक्रिया। लेकिन, सारंगी को बजाना बहुत मुश्किल काम है। शायद आपको मालूम नहीं होगा, सारंगी बजाने में नाखूनों की बड़ी भूमिका होती है। सितार सुनना भी भले ही सुरीला हो, लेकिन इसे भी बजाना कोई आसान नहीं है। कभी-कभी पोरों में ब्लीडिंग हो जाती है। सितार वादक शुभेंद्र राव तबला वादक उस्ताद अकरम की भी हौसलाअफजाई करने से नहीं चूके। बोले कि सालों-साल की तपस्या के बाद एक अकरम सरीखा मिलता है। उन्होंने कहा कि सुर और साज हमारी धरोहर हैं, लेकिन संगीत को शांति की दरकार है। उन्होंने उदाहरण दिया, किसी भी चित्रकार को उकेरने के लिए सफेद कागज और रंग की जरूरत होती है, वैसे ही किसी कलाकार को पिन ड्राप साइलेंट सरीखा माहौल चाहिए।

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