.. मेरे छत पर हो बारिश और उसका आंगन भीगे
पुस्तक प्रदर्शनी के समापन समारोह में हुई कवि गोष्ठी
अमृत विचार, सुल्तानपुर। ‘तमाशाई बने रहना मुझे अच्छा नहीं लगता, किसी मजबूर पर हंसना मुझे अच्छा नहीं लगता। समंदर सूख जाए तो मुझे क्या फर्क पड़ता है, आंखों में पानी सूख जाए तो मुझ अच्छा नहीं लगता।‘ यह पंक्तियां वरिष्ठ साहित्यकार व कवि डॉ. डीएम मिश्रा ने राणा प्रताप स्नातकोत्तर महाविद्यालय व राजकमल प्रकाशन समूह द्वारा क्षत्रिय भवन सभागार में आयोजित सात दिवसीय पुस्तक प्रदर्शनी के समापन समारोह में आयोजित कवि गोष्ठी की अध्यक्षता करते हुए पढ़ीं।
मशहूर शायर हबीब अजमली ने सुनाया ‘अब उनके हाथों में कश्ती की नाखुदाई है, जो जानते नहीं दरिया है क्या समंदर क्या। तुम अपना मशविरा अब अपने पास ही रखो, मैं जानता हूं मेरे वास्ते बेहतर है क्या।‘ एडवोकेट डॉ. अब्दुल मन्नान ने सुनाया ‘इश्क अगर सच्चा हो तो दिखलाई दे ऐसे, मेरे छत पर हो बारिश और उसका आंगन भीगे। दिल भीगे भीगे न भीगे ,दिल की धड़कन भीगे।‘ युवा कवि लोकेश श्रीवास्तव की पंक्तियां थीं ‘तुम सोचते हो तोड़ डालोगे मुझे, मैं इरादा हूं कांच नहीं।‘
गनपत सहाय पीजी कॉलेज में उर्दू के असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ.शाहनवाज आलम की पंक्तियां थीं ‘गंगा जल सा अविरल है भारत, नदियों का संगम है भारत। प्रेम नगर की झील है भारत, सपनों की ताबीर है भारत।‘ संचालन करते हुए वरिष्ठ साहित्यकार मथुरा प्रसाद सिंह जटायु ने सुनाया ‘ठगा गया विश्वास हमारा ठगी गई आशा, गंगा मैली हुई विमल हो गई कर्मनाशा। कोयल के स्वर में कौवे अब गीत लगे गाने, कितना कौन दूध का धोया हुआ राम जाने। पुस्तक प्रदर्शनी के सह संयोजक असिस्टेंट प्रोफेसर ज्ञानेन्द्र विक्रम सिंह रवि, संयोजक प्राचार्य प्रो. दिनेश कुमार त्रिपाठी, इन्द्रमणि कुमार, समूह के प्रबंधक अंजनी कुमार मिश्र आदि रहे।
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