बरेली: मजहब की खाई खोदने वालों के लिए मिसाल हैं हिन्दू-मुस्लिम बहन-भाई
बरेली/शीशगढ़, अमृत विचार। स्नेह के धागों से पिरोया रिश्ता मजबूत होता है। राखी ऐसा ही पर्व है। अपने शहर में कई कहानियां हैं। जहां बहन मुस्लिम तो भाई हिंदू है। कोई भाई मुस्लिम तो बहन हिंदू है। मजहब की खाई खोदने वालों के लिए ये किरदार आंखें खोलने वाले हैं। अब तो मजहब कोई ऐसा …
बरेली/शीशगढ़, अमृत विचार। स्नेह के धागों से पिरोया रिश्ता मजबूत होता है। राखी ऐसा ही पर्व है। अपने शहर में कई कहानियां हैं। जहां बहन मुस्लिम तो भाई हिंदू है। कोई भाई मुस्लिम तो बहन हिंदू है। मजहब की खाई खोदने वालों के लिए ये किरदार आंखें खोलने वाले हैं।
अब तो मजहब कोई ऐसा भी चलाया जाए, जिसमें इंसान को इंसान बनाया जाए…। महाकवि गोपालदास नीरज की लिखी इन पंक्तियों को मीना और अनीता सही साबित कर रही है। शीशगढ़ कस्बे को मोहल्ला गढ़ी निवासी सिलाई मास्टर रफीक अहमद उर्फ एवन मास्टर ने पड़ोस की रहने वाली मीना और अनीता को अपनी बहन बना लिया था। तो मीना व अनीता ने भी भेदभाव को भूलकर मुस्लिम समुदाय के रफीक अहमद से भाई का रिश्ता कायम कर लिया। मीना और अनीता की शादी भी हो गयी लेकिन वे हर साल ससुराल से आकर मुंहबोले भाई रफीक की कलाई पर राखी बांधकर उनके माथे पर टीका लगाकर भाई की दीर्घायु की कामना करती हैं। वही रफीक अहमद भी अपनी बहनों की रक्षा करने का वचन देते हैं। यह सिलसिला पिछले 35 साल से चल रहा है।
कुसुम ने बांधी शाकिब की कलाई पर राखी
मीरगंज के गांव दियोरिया में कुसुम ने मुंह बोले भाई शाकिब हुसैन के हाथ पर राखी बांधी। उनकी दीर्घायु की कामना करते हुए रक्षा का वचन लिया। गांव रईया नगला, चुरई दलपतपुर, शीशम खेड़ा, लभेड़ा दुर्गाप्रसाद, धंतिया, बलुपुरा समेत तमाम गांवों में बहनों ने अपने भाइयों को राखी बांधी। भाई-बहनों ने सेल्फी लेकर फेसबुक और व्हाट्सएप व ट्वीटर पर फोटो शेयर किए। कोरोना संक्रमण के चलते इस बार बाजार में स्वदेशी राखियां छाई रहीं।
