Kanpur News : 27 साल बाद इस बार होलाष्टक नौ दिन के, आज से हो गया शुरू
कानपुर में 27 साल बाद इस बार होलाष्टक नौ दिन के है।
कानपुर में 27 साल बाद इस बार होलाष्टक नौ दिन के है। आज से शुरू हो गया। यह सात मार्च तक चलेंगे। दशमीं तिथि की वृद्धि को लेकर ज्यादा मत। वहीं, कोई एकादशी में वृद्धि बता रहा।
कानपुर, अमृत विचार। इस साल होलाष्टक आठ नहीं बल्कि नौ दिन के होंगे। ऐसा संयोग 27 साल बाद देखा जा रहा है। उस वर्ष एकादशी तिथि की वृद्धि की वजह से एक दिन बड़ा था। इस बार भी एक तिथि की वृद्धि की वजह से होलाष्टक का एक दिवस बढ़ा है। हालांकि ज्योतिषों का किस तिथि वृद्धि की वजह से यह बदलाव हुआ है, उसमें एक मत नहीं हैं। कोई दसमी तो कोई एकादशी की वृद्धि मान रहा है।
ज्योतिषाचार्य पंडित मनोज द्विवेदी ने बताया कि होली से पहले के आठ दिन होलाष्टक कहलाते हैं। इस साल होलाष्टक की शुरुआत 27 फरवरी से हो रही है, जो कि नौ दिनों तक जारी रहते हुए सात फरवरी तक कायम रहेगी। रविवार की आधीरात के बाद 12:59 बजे (तारीख 27 फरवरी) से शुरू हो जाएगी। होलाष्टक फाल्गुन शुक्ल पक्ष अष्टमी से शुरू होकर फाल्गुन शुक्ल पक्ष पूर्णिमा तक रहता है. अष्टमी तिथि से शुरू होने कारण भी इसे होलाष्टक कहा जाता है।
यानी होली आने की पूर्व सूचना होलाष्टक से प्राप्त होती है। इसी दिन से होली उत्सव के साथ-साथ होलिका दहन की तैयारियां भी शुरू हो जाती हैं। उन्होंने बताया कि इस बार पंचांगों में अलग अलग मत हैं। किसी मे एकादशी तो किसी में दसमी की वृद्धि है। लेकिन, इस बार दसमी की वृद्धि स्पष्ट समझी जा रही है।
क्यों होती है शुभ कार्य की मनाही
ज्योतिषाचार्य पंडित द्विवेदी ने बताया कि मुहूर्त विज्ञान और ज्योतिष शास्त्रानुसार प्रत्येक कार्य शुभ मुहूर्तों में किये जाते हैं। होलाष्टक में शुभ कार्य नहीं करने की सलाह दी जाती है। होलाष्टक के दौरान सभी ग्रह उग्र स्वभाव में रहते हैं, जिसके कारण शुभ कार्यों का अच्छा फल नहीं मिल पाता है। होलाष्टक प्रारंभ होते ही प्राचीन काल में होलिका दहन वाले स्थान की गोबर, गंगाजल आदि से लिपाई की जाती थी. साथ ही वहां पर होलिका का डंडा लगा दिया जाता था।
इनमें एक को होलिका और दूसरे को प्रह्लाद माना जाता है। अष्टमी को चंद्रमा, नवमी को सूर्य, दशमी को शनि, एकादशी को शुक्र, द्वादशी को गुरु, त्रयोदशी को बुध, चतुर्दशी को मंगल और पूर्णिमा को राहू उग्र स्वभाव में रहते हैं। इन ग्रहों के उग्र होने के कारण मनुष्य के निर्णय लेने की क्षमता कमजोर हो जाती है जिसके कारण कई बार उससे गलत निर्णय भी हो जाते हैं। जिसके कारण हानि की आशंका बढ़ जाती है ।
क्या करते हैं होलाष्टक में
पंडित मनोज द्विवेदी ने बताया कि फाल्गुन शुक्ल अष्टमी के दिन से ही होलिका दहन स्थान का चुनाव किया जाता है। इस दिन से होलिका दहन के दिन तक इसमें प्रतिदिन कुछ लकड़ियां डाली जाती हैं। पूर्णिमा तक यह लकड़ियों का बड़ा ढेर बन जाता है। पूर्णिमा के दिन शायंकाल शुभ मुहूर्त में अग्निदेव की शीतलता एवं स्वयं की रक्षा के लिए उनकी पूजा करके होलिकादहन किया जाता है।
