पीलीभीत: होली पर आधी आबादी के उत्सव का बजा डंका, मर्द पड़े फीके, महिलाओं के रंगों ने शहर किया चंगा

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Edited By Amrit Vichar
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होली के दूसरे दिन माधोटांडा में महिलाओं की टोली ने मचाया धमाल...जमकर खेला रंग

पीलीभीत/कलीनगर, अमृत विचार। जिले की कलीनगर तहसील के रजवाड़े गांव माधोटांडा में इस बार भी महिलाओं की सत्ता काबिज रही। होली के दूसरे दिन टोली के रूप में निकली महिलाएं पहले ठाकुरद्वारा मंदिर पहुंचीं, जहां से रंग खेलने की शुरुआत हुई। इस दौरान हर महिला होली के रंग में डूबी नजर आईं। महिलाओं ने क्षेत्र में निकलकर फगुआ भी वसूल किया। कहा जाता है कि माधोटांडा गांव में 150 वर्षों से भी अधिक समय से होली के दूसरे दिन महिलाओं की होली मनाई जाती रही है। जहां केवल महिलाओं का राज होता है।

रजवाड़ों का गांव माधोटांडा की होली अपने आप में अनोखी होली कही जाती है। इस होली की चर्चा गांव ही नहीं बल्कि अन्य जिले में भी सुनी जाती है। कहा जाता है कि 150 से 200 वर्षों पूर्व राजस्थान से कई रजवाड़े परिवार यहां पलायन करके आए थे। तब से ही यहां होली के दूसरे दिन महिलाओं की विशेष होली खेली जाती है। खास बात यह है कि महिलाओं की होली में पुरुष हिस्सा नहीं लेते हैं।

धोखे से इनकी सत्ता में अगर कोई पुरुष दखलअंदाजी कर भी दे तो समझ लो उसकी शामत आ गई। इस चक्कर में होली के दूसरे दिन पुरुष ढूंढे भी गांव में नहीं मिलते हैं। यहां तक कई तो गांव छोड़कर अन्य स्थानों पर चले जाते हैं या फिर घरों में ही दुबके रहते हैं। इस दिन महिलाएं क्षेत्र में टोली बनाकर घूम-घूमकर फगुआ भी वसूल करती हैं।

रंगबाजी का सिलसिला दोपहर तक चलता रहता है। इसके बाद महिलाएं स्नान और श्रृंगार कर टोली बनाकर होलिका स्थल पर पूजन के लिए जाती हैं। जहां पूजन कर बड़ों का आशीर्वाद लेकर अगले बरस त्योहार खुशी-खुशी आने की कामना करती हैं।

धुलेंडी वाले दिन केवल पुरुष ही खेलते होली
रजवाड़ा गांव माधोटांडा में धुलेंडी वाले दिन केवल पुरुष ही होली खेलते हैं। इस दिन महिलाओं को रंग नहीं लगाया जाता है। कहा जाता है कि रजवाड़ों से ऐसा चला आ रहा है। महिलाएं पिछले 150 वर्षों से भी अधिक वर्षों से धुलेंडी के दूसरे दिन ही रंग खेलती हैं। इस दिन पुरुष घरों में दुबके रहते हैं।

राधा कृष्ण को तिलक लगाकर शुरू होती है होली
माधोटांडा स्थित राधा-कृष्ण का प्राचीन मंदिर श्री माधव मुकुंद महाराज ठाकुरद्वारा मंदिर से महिलाओं की होली शुरू होती है। बताया जाता है कि यह मंदिर 250 से 300 वर्ष पुराना है। धुलेंडी के दूसरे दिन सबसे पहले महिलाओं की टोली इसी प्राचीन मंदिर में एकत्रित होती है। जहां भगवान राधा-कृष्ण को तिलक लगाकर महिलाओं की होली की शुरुआत होती है।

रजवाड़ों से चली आ रही परंपरा
गांव के बड़े-बुजुर्गों की मानें तो माधोटांडा के राजघराने परिवार के पुरुष पहले दिन आपस में होली खेलते थे। महिलाओं में पर्दा होने के कारण महिलाएं होली के रंगों से वंचित रह जाती थी। इसी को ध्यान में रख राजघराने परिवार के पुरुष दूसरे दिन अपने लाव लश्कर के साथ शिकार को रवाना हो जाते थे। इसके बाद पूरा गांव महिलाओं के लिए छोड़ दिया जाता था। जिससे वे जी भर कर होली खेल सकें।

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