लिंग निर्धारण के आधार पर गर्भपात से लैंगिक असमानता कायम रहती है: दिल्ली उच्च न्यायालय
नई दिल्ली। दिल्ली उच्च न्यायालय ने कहा है कि लिंग का पता लगाकर गर्भपात करना लैंगिक असमानता को कायम रखने का घातक हथियार है। अदालत ने कहा कि जब तक परिवार के स्तर पर रवैये में बदलाव नहीं आता, तब तक ऐसी स्थितियों से सख्ती से निपटने के लिए कानून होने चाहिए। अदालत ने कहा कि भ्रूण में बच्चे का लिंग पता लगाने पर पाबंदी का सीधा संबंध स्त्री जाति से द्वेष से है।
इससे न केवल देश में बल्कि दुनियाभर में सभी सामाजिक-आर्थिक पृष्ठभूमियों की महिलाएं प्रभावित होती हैं। न्यायमूर्ति स्वर्ण कांता शर्मा ने ‘गर्भधारण पूर्व और प्रसव पूर्व निदान तकनीक अधिनियम, 1994’ (पीसीपीएनडीटी कानून) के सख्ती से क्रियान्वयन के लिए अधिकारियों को निर्देश जारी किये। उच्च न्यायालय ने एक डॉक्टर के खिलाफ प्राथमिकी को खारिज करने से इनकार करते हुए यह आदेश दिया। अवैध लिंग निर्धारण के संबंध में सूचना पर यहां एक अस्पताल में छापे के बाद डॉक्टर पर पीसीपीएनडीटी कानून के अनेक प्रावधानों के तहत मामला दर्ज किया गया था।
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