प्रयागराज : दस्तावेजी सबूतों के अभाव में आजीवन कारावास की सजा को किया रद्द
प्रयागराज, अमृत विचार। हाल ही में हत्या के मामले में आजीवन कारावास की सजा पाए दो अभियुक्तों को बरी करते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पाया कि अभियुक्तों को दोषी ठहराने वाली परिस्थितियों की श्रृंखला पूरी नहीं थी। घटना के कथित चश्मदीद गवाहों ने अभियोजन पक्ष की कहानी का समर्थन नहीं किया और कोई दस्तावेजी सबूत भी नहीं था, जो यह स्थापित कर सके कि बरामद राख और जली हुई हड्डियां मृतक की हैं। उक्त आदेश न्यायमूर्ति कौशल जयेंद्र ठाकर और न्यायमूर्ति अरुण कुमार सिंह देशवाल की खंडपीठ ने राजवीर सिंह व अन्य की अपील पर पारित किया है।
मामले के अनुसार प्रथम शिकायतकर्ता हरबीर सिंह आर्य एडवोकेट ने 20 अक्टूबर, 2011 को नरसेना थाना, बुलंदशहर में प्राथमिकी दर्ज कराई कि उसके बेटे लवकेश की शादी राजवीर (अपीलार्थी) की बेटी पूजा (मृतका) से हुई थी, हालांकि वह उसके साथ नहीं रह रही थी। उन्होंने आगे कहा कि 18 अक्टूबर, 2011 को उन्हें किसी गजराज सिंह का फोन आया, जिसने बताया कि उनकी बहू पूजा को उसके माता-पिता, भाई और रहीसुद्दीन (अपीलार्थी संख्या दो) नामक एक शख्स ने जबरदस्ती जहर पिलाकर मार डाला। पुलिस ने जांच के दौरान जहां मृतका को जहर दिया गया था, और जहां से मृतका के शव की राख और हड्डी बरामद की गई थी, उस जगह का साइट प्लान तैयार किया।
राख और हड्डी की बरामदगी के लिए एक रिकवरी मेमो भी तैयार किया गया था। जिसके बाद उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर वर्ष 2017 में अतिरिक्त जिला और सत्र न्यायाधीश (एफटीसी), बुलंदशहर ने उन्हें आजीवन कारावास की सजा सुनाई। सभी तथ्यों पर विचार करते हुए कोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि अभियोजन पक्ष के गवाहों ने अभियोजन की कहानी का समर्थन नहीं किया। पूजा की हत्या का मकसद भी स्पष्ट नहीं हुआ। यहां तक कि फॉरेंसिक साइंस लैबोरेट्री की रिपोर्ट भी बरामद राख और जली हुई हड्डियों के बारे में कोई स्पष्ट राय नहीं देती है।
अदालत ने अपीलकर्ता के तर्कों को सही माना, जिसमें उन्होंने कहा कि उन्हें उन मामलों में समझौता करने के लिए दबाव डालने के उद्देश्य से मौजूदा मामले में फंसाया जा रहा है जो उन्होंने और उनकी बेटी पूजा ने शिकायतकर्ता के खिलाफ दर्ज कराए हैं। न्यायालय ने अपीलकर्ता के इस तर्क को भी उचित माना है कि उन्हें परिस्थितिजन्य साक्ष्य के साथ-साथ साक्ष्य अधिनियम की धारा 106 के तहत केवल एक अनुमान के आधार पर दोषी ठहराया गया था। घटना और संपूर्ण अभियोजन का मामला केवल शिकायतकर्ता के बयान पर आधारित है जो स्वयं घटना का गवाह नहीं था बल्कि उसकी जानकारी अन्य गवाहों से प्राप्त जानकारी पर आधारित थी। उपरोक्त तर्कों के आलोक में हाईकोर्ट ने अपीलकर्ता के खिलाफ पारित आदेश और दोष सिद्धि को रद्द कर दिया।
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