बरेली: ‘साहब, किसे दें रोजगार, प्रवासी तो फिर परदेस चले गए’
महिपाल सिंह गंगवार, बरेली। कोरोना महामारी के दौरान हुए लाकडाउन में गुजरात, दिल्ली, महाराष्ट्र, उत्तराखंड समेत तमाम दूसरे राज्यों में कारखाने बंद होने की वजह से तमाम मुश्किलों का सामना करते हुए प्रवासी कामगार इस उम्मीद से घर लौटे थे कि वे फिर परदेस नहीं लौटेंगे। उनकी अपेक्षा के अनुरूप सरकार भी कुछ सक्रिय दिखी। …
महिपाल सिंह गंगवार, बरेली। कोरोना महामारी के दौरान हुए लाकडाउन में गुजरात, दिल्ली, महाराष्ट्र, उत्तराखंड समेत तमाम दूसरे राज्यों में कारखाने बंद होने की वजह से तमाम मुश्किलों का सामना करते हुए प्रवासी कामगार इस उम्मीद से घर लौटे थे कि वे फिर परदेस नहीं लौटेंगे। उनकी अपेक्षा के अनुरूप सरकार भी कुछ सक्रिय दिखी।
इन प्रवासियों में से अकुशल श्रमिकों को मनरेगा में जोड़कर काम देने और हुनरमंद प्रवासियों को सेवा मित्र एप के माध्यम से उनकी कुशलता के अनुरूप रोजगार देने के दावे किए गए। लेकिन सब कुछ हवा हवाई साबित हुआ। जिस तेजी से प्रवासियों को रोजगार उपलब्ध कराने की मुहिम शुरू हुई,उसी तेजी से यह मुहिम ठंडी पड़ गई है।
इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि सेवा मित्र एप पर 15 हजार प्रवासियों के पंजीकरण होने के कई महीनों बाद भी मात्र 180 प्रवासियों का ही सत्यापन हो सका है। यह आलम तब है जब ढाई माह पहले संबंधित विभाग के माध्यम से प्रवासियों के पंजीकरण की व्यवस्था शुरू की जा चुकी है। इधर, माना जा रहा है रोजगार मिलने की शुरुआत नहीं होने पर कोरोना केस बढ़ने के बावजूद मजबूरी में बड़ी संख्या में प्रवासी उन्हीं जगहों पर फिर से वापस हो गए हैं, जहां से वह अपनी नौकरी छूट जाने के बाद लौटे थे।
15625 प्रवासियों का अब तक हो चुका है पंजीकरण
सेवायोजन विभाग के मुताबिक, निदेशालय से 14750 प्रवासियों की सूची प्राप्त हुई। इनमें 1465 कुशल और 13,285 अकुशल प्रवासी शामिल हैं। सेवा मित्र एप पर इनके अलावा 855 आवेदन ओर आए। इनको मिलाकर कुल संख्या 15625 हो गई। वहीं, इसमें सबसे बड़ी समस्या यह बनी है कि इनमें पुलिस वैरिफिकेशन मात्र 225 लोगों का ही सका है।
इसकी एक वजह यह भी बताई जा रही है कि कई प्रवासी ऐसे हैं, जो लंबे समय से घर से बाहर परिवारीजन के साथ नौकरी कर रहे हैं। उनके पास स्थानीय दस्तावेज नहीं है। वहीं, शासन ने भी कुशल कामगार सिर्फ उन्हीं को माना है, जिनके पास संबंधित कार्य का डिप्लोमा या सर्टिफिकेट है।
जवाब दे गया धैर्य तो फिर बने प्रवासी
सरकार के अधिकांश विभाग अपने यहां रोजगार के अवसर सृजित कर रहे हैं। उसका दावा भी बढ़ा-चढ़ाकर पेश कर रहे हैं, मगर हकीकत इसके उलट है। सरकार की हीलाहवाली से कामगारों का धैर्य एक बार फिर जवाब दे गया, जब प्रवासियों के परिवार के सामने रोजी-रोटी का संकट खड़ा हुआ तो उन्हें फिर से पलायन करना पड़ा। बंदिशें खत्म होते ही गांव के गांव युवाओं से खाली होते जा रहे हैं। एक अनुमान के मुताबिक 50 फीसदी से अधिक कामगार दोबारा दूसरे राज्यों में पहुंच चुके हैं। इन्हें लाने के लिए दूसरे राज्यों से बकायदा मिनी बसें भी भेजी जा रही हैं।
“निदेशालय द्वारा भेजी सूची के आधार पर संबंधित विभाग की सहायता से ब्लाक स्तर पर कैंप लगाकर प्रवासियों की काउंसलिंग कराने के साथ ही सेवा मित्र एप पर पंजीकरण कराया गया। पुलिस सत्यापन में कुछ अड़चनें आ रही हैं, जिसकी वजह से सत्यापन नाममात्र हो सके हैं।” -त्रिभुवन सिंह, सहायक निदेशक, सेवायोजन
