Career : खेल भी है अच्छा करियर ऑप्शन, जानें क्या कहते हैं जूनियर एशिया कप जीतने वाले खिलाड़ी
लखनऊ, अमृत विचार। पढ़ोगे लिखोगे तो बनोगे नवाब, खेलोगे कुदोगे तो बनोगे खराब, यह कहावत मौजूदा समय में खास महत्व नहीं रखती है। खेल के माध्यम से भी अच्छा करियर बनाया जा सकता है, बस जरूरत है कड़ी मेहनत करने की। इस बात को चरितार्थ कर रहे हैं जूनियर एशिया कप जितने वाली भारतीय जूनियर हॉकी टीम के खिलाड़ी शारदानंद तिवारी। केंद्र सरकार से लेकर प्रदेश सरकार भी इसके लिए लगातार प्रयास कर रही है कि खेल और खिलाड़ियों का भविष्य ऊंचाइयों को छुये।
दरअसल, आज भी समाज का एक बड़ा तपका अपने बच्चों को खेलने की बजाय पढ़ने पर ज्यादा जोर देता है, लेकिन यदि बच्चे खेलना चाहें और उस क्षेत्र में मेहनत करें तो कम से कम सामान्य से तो अच्छा करियर बना ही सकते हैं। यह हम नहीं कह रहे हैं बल्कि पाकिस्तान को हराकर भारत लौटी हॉकी टीम के खिलाड़ी शारदानन्द का कहना है। शारदानन्द तिवारी बताते हैं कि उनका पढ़ने में ज्याद मन नहीं लगता था, घर की माली हालत भी ठीक नहीं थी कुछ पढ़ाई के लिए खास कर सकें। दिन भर पतंग उड़ाना और घूमना बस एक ही काम था। अचानक एक दिन पतंग उड़ाने पास के स्टेडियम पहुंचे, तो वहां पर नीलम नाम की एक अधिकारी थी, उन्होंने कहा कि पतंग उड़ाने से अच्छा है हॉकी खेलो और तभी से इस खेल को खेलना शुरू किया।
वह बताते हैं कि महज आठ साल की मेहनत में वह नेशनल खेलने के साथ जूनियर वर्ल्ड कप और जूनियर एशिया कप जैसी बड़ी प्रतियोगिताओं में हिस्सा ले चुके हैं। इस दौरान गोल्ड मेडल तो जीता ही साथ ही कई देशों की यात्रा भी की। वह बताते हैं कि जब उन्होंने खेलना शुरू किया था तो उनके साथ करीब 8 से 10 लोगों ने भी हॉकी खेलनी शुरू की थी, लेकिन कई बच्चों ने कुछ साल खेलने के बाद मैदान छोड़ दिया। आज दस से 15 हजार की नौकरी कर रहे हैं। उन्होंने यहां तक बताया कि मेरे बड़े भाई भी बहुत कम वेतन पर नौकरी कर रहे हैं। जबकि वह पढ़ाई में अच्छे थे।
शारदानन्द ने साफ तौर पर कहा कि जिस प्रकार पढ़ाई के लिए लंबा समय और मेहनत करनी होती है साथ ही करियर बनाने के लिए धैर्य की आवश्यकता होती है। ठीक उसी तरह खेल में भी आपकों धैर्य और मेहनत की जरूरत होती है। उन्होंने बताया कि उनके घर की माली हालत बहुत खराब थी, लेकिन जीवन में कुछ बड़ा करने के लिए उन्होंने हॉकी को चुना और धीरे-धीरे ही सही पर अपनी मंजिल के तरफ बढ़ रहे हैं।
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