लखनऊ : हीमोफीलिया से पीड़ित मरीज का घुटना और कूल्हा प्रत्यारोपित करने वाला यूपी का पहला संस्थान बना KGMU
लखनऊ, अमृत विचार। किंग जार्ज चिकित्सा विश्वविद्यालय (केजीएमयू) स्थित आर्थोपेडिक विभाग के डॉक्टरों ने हीमोफीलिया ए बीमारी से पीड़ित 35 वर्षीय मरीज का हिप रिप्लेसमेंट करने में सफलता हासिल की है। इससे पहले मरीज का विभाग में ही घुटना प्रत्यारोपण सफलता पूर्वक हो चुका है। हीमोफिलिया ए बीमरी से पीड़ित युवक को अब किसी पर आश्रित नहीं रहना पड़ेगा। केजीएमयू उत्तर प्रदेश का पहला ऐसा संस्थान है जहां पर हीमोफिलिया ए बीमारी से पीड़ित युवक का घुटना और कूल्हा प्रत्यारोपण किया गया है। इससे पहले उत्तर प्रदेश के किसी भी संस्थान में इस तरह की सर्जरी नहीं हुई है।
दरअसल, हीमोफीलिया बीमारी में किसी कारण भी शरीर से खून बहना शुरू होता है, तो वह बंद नहीं होता है। ऐसे में हीमोफीलिया के मरीज की सर्जरी करना जोखिम भरा होता है, लेकिन केजीएमयू के आर्थोपेडिक विभाग के डॉ.शैलेन्द्र सिंह ने हीमोफीलिया ए से पीड़ित मरीज कुलदीप (35) की हालत देखकर सर्जरी करने का फैसला किया। डॉ.शैलेन्द्र सिंह ने हेमेटोलॉजी विभाग के डॉक्टरों से बात कर इस चुनौतीपूर्ण सर्जरी की तैयारी शुरू की।
डॉ.शैलेन्द्र ने अमृत विचार को बताया कि कुलदीप को हीमोफीलिया ए की बीमारी एक वर्ष की आयु से ही है। इस बीमारी के चलते कुलदीप के जोड़ खराब हो गये थे। मरीज चलने फिरने में असमर्थ था। जिसके कारण सबसे पहले मरीज के घुटने का प्रत्यारोपण किया गया। उसके करीब एक साल बाद 12 जुलाई को कूल्हे का प्रत्यारोपण किया गया है। जिसमें करीब एक घंटे का समय लगा। एक सप्ताह बाद मरीज को छुट्दी दे दी गई थी। उन्होंने बताया कि यह सर्जरी काफी चुनौतीपूर्ण थी, हांलाकि इसके बाद अब कुलदीप को चलने फिरने के लिए किसी का सहारा नहीं लेना पड़ेगा।
क्या है हीमोफीलिया
डॉ.शैलेन्द्र ने बताया कि हीमोफीलिया एक अनुवांशिक बीमारी है। जिसमें खून का थक्का नहीं बनता है। जब शरीर के किसी हिस्से में चोट लग जाती है और खून बहना शुरू होता है तो खून का थक्का बनाने वाले घटक प्लेटलेट्स के साथ मिलकर खून को गाढ़ा करते हैं और खून बहना रुक जाता है, लेकिन जो लोग हीमोफीलिया बीमारी से ग्रसित होते हैं उन लोगों में खून का थक्का बनाने वाले घटक की मात्रा बहुत कम होती है। जिससे खून का बहना बंद नहीं हो पाता है।
दो तरह का होता है हीमोफीलिया
डॉ.शैलेन्द्र सिंह ने बताया कि हीमोफीलिया के दो प्रकार होते हैं। हीमोफीलिया ए और हीमोफीलिया बी। हीमोफीलिया ए में फैक्टर 8 कम पाया जाता है। वहीं बी में फैक्टर 9 कम होता है। दोनों ही फैक्टर खून का थक्का बनाने के लिए जरूरी होते हैं। यह बहुत ही गंभीर बीमारी है। इससे बचने के लिए लोगों का जागरुक होना बहुत जरूरी है।
सर्जरी करने वाली टीम
आर्थोपेडिक विभाग से प्रो. शैलेंद्र सिंह, हेमेटोलॉजी विभाग से एसपी वर्मा और एनेस्थीसिया से डॉ. अजय चौधरी व अन्य डॉक्टर शामिल रहे।
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