अजय राय को अध्यक्ष बना कांग्रेस ने खेला भूमिहारों पर दांव
पूर्वांचल की 14 लोकसभा सीटों पर प्रभावी हैं भूमिहार, 2019 में सपा-बसपा ने भाजपा से छीनी थी 4 सीटें
महेश शर्मा, अमृत विचार, कानपुर। कांग्रेस ने अपना सूबेदार बदल दिया है। लोकसभा चुनाव 2024 के मद्देनजर पूर्वांचल में फतह के लिए यह भूमिहार कार्ड खेलना जरूरी हो गया था। ब्रजलाल खाबरी को हटाकर यूपी के प्रदेश अध्यक्ष बनाए गए अजय राय की पूर्वांचल पर बेहतर पकड़ बतायी जाती है। खाबरी का 2022 के विधानसभा में प्रदर्शन काफी फीका था। कांग्रेस को दो सीटों पर संतोष करना पड़ा था। लोकसभा चुनाव 2019 में सिर्फ सोनिया गांधी ही रायबरेली से जीत सकी थी। पूर्वांचल में भाजपा के प्रत्याशी के मुकाबले 26 दलों के विपक्षी गठबंधन ‘इंडिया’ के संयुक्त प्रत्याशी के मैदान में उतरने से भाजपा को कड़ी चुनौती मिल सकती है।
पूर्वांचल कभी कांग्रेस का गढ़ हुआ करता था। फिर समाजवादी पार्टी तो कभी बसपा की पैठ थी अब यह 26 सीटों वाला पूर्वांचल भगवामय होकर भाजपा का गढ़ बन चुका है। 2014 में भाजपा को यहां 23 सीटें मिली थी। दो सीटें सहयोगी दलों को गयी थी। यानी 26 में से 25 सीटें जीतकर भाजपा ने यहां दमखम दिया है। 2019 में सपा-बसपा गठबंधन मैदान में था। तब भाजपा को यहां चार सीटों का नुकसान हुआ था। 2014 में शून्य पर रहने वाली बसपा को ये चारों सीटें मिली थी। ऐसे में यदि बसपा अकेले भी उतरती है तो प्रभाव डाल सकती है जिसका लाभ किसे होगा यह वक्त बताएगा। जातीगत समीकरण से प्रभावित पूर्वांचल की राजनीति का असर पंचायत से लेकर लोकसभा चुनाव तक साफ देखा जा सकता है।
अजय राय की पूर्वांचल की कमान देने के पीछे कांग्रेस की यह सोच भी हो सकती है कि यहां की राजनीति में भूमिहार वोटों को करीब 14 सीटों पर निर्णायक भूमिका में बताया जाता है। अजय राय की कांग्रेस में एंट्री 2012 में तब हुई थी जब दिग्विजय सिंह कांग्रेस के प्रभारी महामंत्री हुआ करते थे। यह वोट अब तक भाजपा को मिलता रहा है। मोदी की बयार से पहले कांग्रेस का भी यहां चुनावी दबदबा हुआ करता था।
सूबे की राजनीति में लगभग सभी दल भूमिहारों को साधने में जुट जाते हैं। राजनीतिक पंडित बताते हैं कि पूर्वांचल में गोरखपुर से लेकर प्रयागराज और फूलपुर से लेकर सलेमपुर तक भूमिहार वोटरों का राजनीतिक वर्चस्व है जो समीकरण बनाने और बिगाड़ने की क्षमता रखता है। अजय राय के बहाने कांग्रेस सीटों के बंटवारे में पूर्वांचल से भी कुछ सीटों पर दावा कर सकती है। दूसरे यह कि ‘इंडिया’ के प्रत्याशी को भाजपा के खिलाफ ताकत मिल सकती है।
बलिया लोकसभा क्षेत्र में करीब तीन लाख तो घोसी लोकसभा में डेढ़ लाख भूमिहार वोट है। घोसी में हो रहे उपचुनाव में अजय राय के कारण भूमिहार वोट में सेंधमारी की जा सकती है और ‘इंडिया’ के घटक सपा प्रत्याशी भाजपा के समक्ष चुनौती प्रस्तुत कर सकते हैं। गाजीपुर गोरखपुर, देवरिया, सलेमपुर, चंदौली, वाराणसी, प्रयागराज, मछलीशहर, जौनपुर, आजमगढ़, लालगंज, मीरजापुर लोकसभा क्षेत्र में भूमिहार वोट ठीकठाक संख्या में बताया जाता है। भाजपा ने मनोज सिन्हा को भूमिहार नेता के रूप में प्रोजेक्ट किया था। पर वह गाजीपुर से 2019 में हार गए थे। राजीव राय, अतुल राय जैसे भूमिहार नेता सपा, बसपा के पास हैं।
थोड़ा पीछे जाएं तो पता चलता है कि इंदिरा गांधी के दौर में कल्पनाथ राय बड़े नेता हुआ करते थे। उनके बाद भाजपा के कृष्णानंद राय भूमिहारों के नेता के रूप में उभरे थे पर उनकी हत्या कर दी गयी। उनकी पत्नी अलका राय ने एक चुनाव में मुख्तार अंसारी की पार्टी कौमी एकता का समर्थन लेने वाले कृष्णानंद राय के भाई अजय राय पर आरोप भी जड़े थे। अब 2024 के चुनाव में फिर दलों को भूमिहार वोट याद आ गए। भूमिहारों को पूर्वांचल में राय और पश्चिम में त्यागी उपजाति से जाना जाता है।
