लखनऊ : कई जिंदगियों के बचाने में जुटे डॉ.हर्षवर्धन, कहा- अगंदान कर हो सकते हैं अमर
लखनऊ, अमृत विचार। इंसान भी अमर हो सकता है, वह भी बिना अमृत पिये, बस जरूरत है तो अंगदान जैसा पूण्य कार्य करने की। किसी के पिता, किसी के भाई, किसी की बहन, किसी की मां अचानक साथ छोड़ जाते हैं, लेकिन यदि उनके परिजन चाहें, तो जिंदगी की जंग हार चुके इन लोगों की वजह से किसी के पिता, किसी के भाई, किसी की बहन, किसी की मां को बचाया जा सकता है। यदि किसी शख्स को डॉक्टर ने ब्रेन स्टेम डेथ या फिर ब्रेन डेड घोषित कर दिया है, तो ऐसे मरीज के परिजन चाहें तो करीब 8 लोगों के जीवन को बचा सकते हैं। यह जानकारी सोटो यूपी के संयुक्त निदेशक और एसजीपीजीआई स्थित अस्पताल प्रशासन विभाग के विभागाध्यक्ष डॉ आर हर्षवर्धन ने दी । वह राजधानी स्थित कमांड अस्पताल में आयोजित जागरुकता कार्यक्रम को संबोधित कर रहे थे।

इस अवसर पर डॉ राजेश हर्षवर्धन ने कहा कि अंग और ऊतक दान के क्षेत्र में चिकित्सा विज्ञान में काफी प्रगति कर ली है। उन्होंने कहा कि जहां एक व्यक्ति के अंग दान से 8 लोगों की जान बच सकती है, वहीं ऊतक दान से लगभग 75 व्यक्तियों के जीवन में सुधार होता है, लेकिन अंगदान को लेकर आज भी कई भ्रांतियां हैं, जिसके कारण जिन मरीजों को प्रत्यारोपण की जरूरत है। उन्हें समय पर अंग नहीं मिल पाते और उनकी जान चली जाती है। उन्होंने बताया कि कई लोगों की सड़क दुर्घटना में घायल हो जाते हैं, इलाज के दौरान चिकित्सक ऐसे मरीजों को ब्रेन स्टेम डेथ घोषित कर देते हैं। ब्रेन स्टेम डेथ व्यक्ति के परिजन चाहें तो उनका अंगदान कर कई लोगों के जीवन में उजाला लाने का काम कर सकते हैं।
उन्होंने बताया कि एक अनुमान के अनुसार भारत में प्रतिवर्ष लगभग 2 लाख मरीज़ों की लिवर फेल्योर या लिवर कैंसर से मृत्यु हो जाती हैं, जिनमें से लगभग 10 - 15 प्रतिशत को समय पर लिवर प्रत्यारोपण से बचाया जा सकता था। इसलिए, भारत में सालाना लगभग 25 - 30 हजार लिवर प्रत्यारोपण की आवश्यकता होती है, लेकिन केवल लगभग 1,500 ही किए जा रहे हैं। इसी प्रकार, लगभग 500,000 व्यक्ति प्रतिवर्ष हार्ट फेलियर से पीड़ित होते हैं, लेकिन भारत में हर वर्ष लगभग 10-15 हृदय प्रत्यारोपण ही किए जाते हैं। पूरे भारत में लोगों को किडनी, लीवर, हृदय, कॉर्निया और फेफड़े के प्रत्यारोपण की अत्यधिक आवश्यकता है।
राष्ट्रीय अंग एवं ऊतक प्रत्यारोपण संगठन (एनओटीटीओ) के राष्ट्रीय आंकड़ों के अनुसार, 1995 के बाद से, केवल 2,546 लोगों ने अपनी मृत्यु के बाद अपने अंगों को दान करने का विकल्प चुना, इस प्रकार वे मृत अंग दाता बन गए, जबकि 34,094 लोगों ने जीवित रहते हुए अपने अंगों को दान करने का विकल्प चुना। राष्ट्रीय तस्वीर की तुलना में उत्तर प्रदेश (यू.पी.) राज्य में अंग दान का परिदृश्य 2015 से 32 मृत दाताओं और 1,876 जीवित दाताओं का है।
क्या होता है ब्रेन स्टेम डेथ
प्रो. राजेश हर्षवर्धन ने बताया कि ब्रेन डेड घोषित मरीज वेंटीलेटर के सहारे पर होता है, ब्रेन में ब्लड और ऑक्सीजन की सप्लाई नहीं होती है। बेन डेड मरीज के रिकवरी की संभावना लगभग पूरी तरह समाप्त माना जाता है। इस दौरान उन्होंने यह भी बताया कि कोमा और ब्रेन डेड दोनों अगल- अलग स्थित हैं। यदि एक प्रतिशत भी ब्रेन काम करता है तो उस स्थिति को कोमा कहा जाता है। उन्होंने बताया कि ब्रेन डेड होने पर व्यक्ति के शरीर और आंखों का मूवमेंट बंद हो जाता है, सिर्फ लिवर, हार्ट और किडनी व अन्य अंग कुछ समय तक ही काम करते हैं।
केडेवेरिक अंगदान की सहमति पर नहीं पड़ेगा इलाज खर्च
इस दौरान उन्होंने इस जानकारी को भी साझा किया कि एसजीपीजीआई में केडेवरिक अंगदान (Cadaveric organ donation) को बढ़ावा मिले, इसके लिए नई व्यवस्था लागू की गई है। उन्होंने बताया की इस व्यवस्था के तहत संस्थान के ट्रामा सेंटर में घायल मरीज के ब्रेन स्टेम डेथ घोषित होने पर यदि उसके परिवार के सदस्य अंगदान करना चाहें, तो मरीज के इलाज का सारा खर्च संस्थान वहन करेगा, मरीज के परिजनो से खर्च के तौर पर कुछ नहीं लिया जायेगा।
इस अवसर पर एसजीपीजीआई के प्रो. नारायण प्रसाद, ले.कर्नल रत्नेश शुक्ला समेत कई डॉक्टर उपस्थित रहे।
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