अयोध्या: दस दिनों में हो गई 90 फीसदी बरसात, फसलों का हलक सूखा
अयोध्या, अमृत विचार। मानसून के बिगड़े मिजाज ने पैमाने और परिभाषा को बदल दिया है। कभी सावन झमाझम बरसात और जलभराव की पहचान हुआ करता था और अब गर्मी, उमस का पर्याय बन गया है। सरकारी आंकड़ों में भले ही बरसात की तस्वीर कुछ ज्यादा गड़बड़ न हो लेकिन हालात ने प्रकृति और फसल चक्र को गंभीर रूप से प्रभावित किया है। आम जनजीवन उमस और गर्मी से परेशान है तो फसलों पर भी मौसम की मार पड़ रही है। किसानों को रात-दिन खेत में खड़ी फसलों की सिंचाई करनी पड़ रही है। उत्पादन लागत बढ़ने का असर बाजार पर भी दिखने लगा है।
पारंपरिक रूप से देखें तो बरसात के सीजन को शीत ऋतु का प्रवेश द्वार माना जाता है। ऐसा बरसात और फसलों की हरियाली से मौसम में बदलाव के चलते होता है। वर्तमान वर्ष की बात करें तो गत माह अगस्त में कुल 236.4 मिमी बरसात हुई, जो सामान्य की 90 फीसदी है। हालांकि मौसम विभाग के आंकड़ों के मुताबिक यह 90 फीसदी बरसात माह के 31 दिनों के सापेक्ष 10 दिनों में ही रिकॉर्ड की गई।
यही हाल बरसाती सीजन के अन्य महीनों का भी रहा। बरसात में लंबा अंतराल के चलते इसका सीधा असर मौसम और फसलों पर देखने को मिला। ज्यादा पानी वाली खेत में खड़ी धान, गन्ना समेत सब्जियों की फसलों में बरसाती सीजन होने के बावजूद बार-बार सिंचाई करनी पड़ रही है। खेत से लेकर ताल-तलैया तक सूखे पड़े हैं। अब तो मौसम व कृषि वैज्ञानिक भी उड़द, मूंग की फसलों में भी पानी लगाने की हिदायत देने लगे हैं।
जून-जुलाई भी रहा सूखा
मानसून की दस्तक जून माह के दूसरे सप्ताह में मानी जाती है। हालांकि इसके पूर्व प्री-मानसून की बरसात होती रही है, लेकिन इस बार तस्वीर कुछ बदली नजर आई। बरसाती सीजन का जून-जुलाई माह भी सूखा रहा। मानसून की दस्तक से पूर्व मई माह में बरसात 68.2 मिमी रिकॉर्ड हुई तो मानसून सक्रिय होने के बाद जून माह में भी बरसात का आंकड़ा 81.6 मिमी (सामान्य का 61 फीसदी) ही पहुंच पाया। जुलाई माह में भी सामान्य का 64 फीसदी 188.2 मिमी ही बरसात हुई।
22 वर्षों में 17 साल औसत से कम बरसा पानी
मानसून की बेरुखी केवल इसी साल नहीं दिख रही बल्कि यह हाल बीते दो दशक से ज्यादा समय का है। कृषि विश्वविद्यालय के मौसम विभाग के आंकड़ों के मुताबित बीते 22 वर्षों में 17 वर्ष औसत से कम बरसात हुई। सालाना वर्ष सामान्य वर्षा 946.72 मिमी मानी जाती है। अधिकतम और न्यूनतम की बात करें तो वर्ष 1989 में 1387 मिमी अधिकतम और 2015 में 542.03 न्यूनतम रिकॉर्ड हुई।
तीन बीघा धान की फसल लगाया गया है। बारिश न होने के चलते हर चौथे दिन सिंचाई करनी पड़ रही है। सिंचाई पर एक बार में 600 रुपये का डीजल लग रहा है, लगता है कि उत्पादन मूल्य से ज्यादा सिंचाई में ही खर्च हो जाएगा...,जागेश्वर निषाद, किसान, भदरसा, अयोध्या।
बरसात न होने से सूखे जैसी स्थिति बन गई है। धान और गन्ने की फसल को बचा पाना अब मुश्किल हो गया है। ट्यूबवेल है लेकिन बिजली कटौती इतनी हो रही है कि खेतों में पानी पहुंचना मुश्किल हो गया है। डीजल से सिंचाई करनी पड़ रहा है। 5 बीघा धान पैदा करने में कठिनाई का सामना करना पड़ रहा है यदि बरसात नहीं हुई तो फसल सूख कर खराब हो जाएगी।
- सत्य प्रकाश मिश्रा, किसान मसौधा, अयोध्या।
5 बीघा धान और 6 बीघा गन्ना की फसल बरसात न होने के चलते अब सूखने के कगार पर है। रात में बिजली से फसल की सिंचाई करनी पड़ रही है। डीजल महंगा होने के चलते आर्थिक नुकसान भी हो रहा है। यही स्थिति रही तो फासल बर्बाद हो जाएगी। पिंटू वर्मा, किसान, पूरा बाजार, अयोध्या।
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