प्रयागराज: राज्य की निष्पक्ष निविदा कार्यवाही में कोर्ट नहीं कर सकता हस्तक्षेप
प्रयागराज। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक निविदा मामले में सुनवाई करते हुए कहा कि राज्य द्वारा निष्पक्ष रूप से की गई निविदा कार्यवाही में कोर्ट आसानी से हस्तक्षेप नहीं कर सकता है, क्योंकि किसी भी बोली लगाने वाले को सरकार के साथ व्यापार करने का मौलिक अधिकार नहीं है।
सुप्रीम कोर्ट के विभिन्न फैसलों का हवाला देते हुए न्यायमूर्ति महेश चंद्र त्रिपाठी और न्यायमूर्ति प्रशांत कुमार की खंडपीठ ने मेसर्स जय हनुमान कंस्ट्रक्शन जगदीश शरण की याचिका पर सुनवाई करते हुए कहा कि मौजूदा याचिका पर विचार करते समय न्यायालय को केवल यह देखना होगा कि क्या निर्णय लेने की प्रक्रिया में कोई त्रुटि हुई है या अधिकारियों ने अपने अधिकार क्षेत्र का उल्लंघन किया है या प्राकृतिक न्याय के किन्हीं नियमों का उल्लंघन हुआ है।
दरअसल मिर्जापुर में राजमार्ग संख्या 150 के विस्तार और सौंदर्यीकरण को 18 महीने के भीतर पूरा करने के लिए निविदाएं आमंत्रित करने के लिए नोटिस जारी की गई थी। याची ने अपनी तकनीकी बोली प्रहरी वेबसाइट पर ऑनलाइन जमा करने का दावा किया। वेबसाइट पर घोषित परिणाम में याची की तकनीकी बोली को सभी प्रकार से उत्तरदायी घोषित किया गया, लेकिन बाद में निविदा मूल्यांकन समिति द्वारा चालान में विसंगतियों के आधार पर याची की बोली को गैर-उत्तरदायी घोषित कर दिया गया।
याची का आरोप है कि टेंडर प्रक्रिया उस अधिकारी द्वारा आयोजित की गई थी, जिसे इंजीनियर-इन-चीफ के निर्देशों के अनुसार इसे किसी अन्य अधिकारी को सौंपना था। इसके अलावा याची का यह भी आरोप है कि प्रहरी वेबसाइट से कुछ दस्तावेज हटा दिए गए थे। इस पर राज्य के अधिवक्ता ने तर्क दिया कि निविदा प्रक्रिया पारदर्शी थी और सफल बोली लगाने वाले द्वारा पर्याप्त कार्य पहले ही पूरा कर लिया गया था।
राज्य के पास निविदा योग्यता, शर्तें तय करने की शक्ति है जो न्यायिक जांच के लिए खुली नहीं है। अंत में कोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि अगर राज्य तर्कसंगतता की सीमा के भीतर कार्य करता है तो निविदा मामले न्यायिक समीक्षा के दायरे से बाहर रहते हैं। ऐसे मामलों में न्यायालय का हस्तक्षेप बहुत प्रतिबंधात्मक है, क्योंकि कोई भी बोली लगाने वाला सरकार के साथ व्यापार करने के मौलिक अधिकार का दावा नहीं कर सकता है। चूंकि याची राज्य की कार्यवाही को मनमाना, दुर्भावनापूर्ण, विकृत प्रदर्शित करने में विफल रहा, अतः याचिका खारिज कर दी गई।
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