पितृविसर्जन विशेष : बुंदेलखंड में बालिकाएं ‘महबुलिया’ के जरिए करती हैं पुरखों का तर्पण 

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आधुनिकता की चकाचौंध में विलुप्त होता जा रहा यह पर्व

पवन तिवारी/ बांदा, अमृत विचार। बुंदेलखंड में लोक जीवन के विविध रंगों में पितृपक्ष पर पूर्वजों के प्रति श्रद्धा व समर्पण का भी अंदाज अलग है। पुरखों के तर्पण के लिए यहां पूजन, अनुष्ठान, श्राद्ध आदि के आयोजनों के अलावा बालिकाओं की महबुलिया पूजा बेहद खास है, जो इंटरनेट की दुनिया में नई पीढ़ी को संस्कार सिखाता है। पूरे सोलह दिनों तक चलने वाले इस कार्यक्रम में गोधूलि वेला पर हर रोज पितृ आह्वान और विसर्जन के साथ इसका आयोजन होता है। इस दौरान यहां के गांवों की गलियों और चौबारों में बच्चों की तोतली मीठी आवाज में गाए जाने वाले महबुलिया के पारंपरिक लोकगीत मधुरु स्वर में गूंजते हैं।

सनातन धर्म ही अपने आपमें विलक्षण है। इसकी उदारता का अंदाजा यहीं से लगाया जा सकता है कि हमारे पूर्वजों ने पितृ पक्ष में उन नदियों और पर्वतों तक के तर्पण का विधान समाहित किया, जो कभी इस धरती पर हुआ करते थे। सनातन धर्म की मान्यता के अनुसार हर इंसान पर देवऋण, ऋषिऋण और मातृ-पितृ ऋण होता है, जिसे इसी धरती पर चुकाए बिना न तो परमात्मा की कृपा मिलती है और न ही अंत समय में मोक्ष की ही प्राप्ति होती है। इसलिए पितृ पक्ष के सोलह दिनों में पूर्वजों के तर्पण का विधान रखा गया है। इन्हीं दिनों में लोग अपने पूर्वजों का श्राद्ध भी करते हैं। 

समूचे विंध्य क्षेत्र में लोकपर्व का दर्जा प्राप्त महबुलिया की पूजा का भी अपना अलग ही तरीका है। बालिकाएं कई समूहों में बंटकर इसका आयोजन करती हैं। पं.उमाकांत त्रिपाठी (क्योटरा) ने बताया कि महबुल (कंटीले झाड़) को रंग बिरंगे फूलों और पत्तियों से सजाया जाता है। विधिवत पूजन के उपरांत सजे हुए झाड़ को बालिकाएं गीत गाते हुए किसी तालाब या पोखर में ले जाते हैं। जहां फूलों को कांटों से अलग कर पानी में विसर्जित कर दिया जाता है। महबुलिया विसर्जन के बाद बालिकाएं लाई और भिगोए हुए चने की दाल आदि का प्रसाद बांटती हैं। यह प्रसाद सभी बच्चे अपने घरों से अलग-अलग लाते हैं। बुंदेलखंड में सदियों पूर्व से प्रचलित परंपरा की शुरूआत कब और कैसी हुई? इस बात का शास्त्रों या अन्य कहीं कोई उल्लेख नहीं है। 

उन्होंने कहा कि मान्यता है कि सदियों पूर्व महबुलिया नाम की एक वृद्ध महिला थी जिसने इस विशेष पूजा की शुरूआत की थी। बाद में इसका नाम ही महबुलिया पड़ गया। एक किवदंति यह भी है कि जो बालिकाएं असमय काल के गाल में समा गईं हैं उन्हीं के तर्पण लिए बालिकाएं महबुलिया सजाकर उनका जल तर्पण करती हैं। उन्होंने कहा कि बदलते दौर में सांस्कृतिक मूल्यों के तेजी से हस होने की वजह से महबुलिया भी विलुप्त हो चली है। आधुनिकता की चकाचौंध में बुंदेलखंड के नगरीय इलाकों में तो इसका आयोजन लगभग खत्म हो गया है। ग्रामीण क्षेत्रों में भी वर्षों पुरानी परंपरा दम तोड़ती नजर आ रही है।

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