UP: अज्ञातवास में मां सिंहवाहिनी की आराधना करते थे पांडव, इस मंदिर में मनोकामनाएं होती है पूरी, ऐसे है मान्यता

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Edited By Amrit Vichar
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बांदा के मां सिंहवाहिनी के मंदिर में नवरात्र में भक्तों की भीड़ उमड़ती है।

बांदा के मां सिंहवाहिनी के मंदिर में नवरात्र में भक्तों की भीड़ उमड़ती है। देवी भक्त मां की आराधना करके अपने मनोवांछित फल प्राप्त करने को साधना करते हैं। सिंहवाहिनी मंदिर की स्थापना के इतिहास को लेकर कई किंवदंतियां चर्चित है।

बांदा, अमृत विचार। शहर के कटरा मोहल्ले में स्थापित मां सिंहवाहिनी का दरबार वैसे तो पूरे साल भक्तों की आवाजाही से गुलजार रहता है, लेकिन नवरात्र के मौके पर यहां श्रद्धालुओं की अपार भीड़ उमड़ती है और देवी भक्त मां की आराधना करके अपने मनोवांछित फल प्राप्त करने को साधना करते हैं। सिंहवाहिनी मंदिर की स्थापना के इतिहास को लेकर कई किंवदंतियां चर्चित है। 

जानकार बताते हैं कि मां सिंहवाहिनी की स्थापना ऋग्वेद काल में केन नदी के तट पर की गई थी। हालांकि बाद में चंदेलवंशीय राजाओं के 831 ई. और राजा कीरत सिंह के 1746 ई. में मंदिर की पुर्नस्थापना किए जाने का उल्लेख मिलता है। वहीं मां सिंहवाहिनी की मूर्तियां में गुप्त साम्राज्य की कलाकृतियों की भी झलक देखने को मिलती है।

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हालांकि मंदिर की स्थापना को लेकर कोई प्रमाणिक साक्ष्य तो उपलब्ध नहीं है लेकिन बुजुर्गों की परिपाटी और चर्चित किंवदंतियों के अनुसार मंदिरों को हजारों वर्ष पुराना माना जा रहा है। इतिहास और वेद-पुराणों के जानकारों की मानें तो कर्म, भक्ति और ज्ञान की त्रिवेणी बहाने वाली मां सिंहवाहिनी के मंदिर की स्थापना को लेकर ऋग्वेद में भी वर्णन मिलता है।

पुराणों में मिले उल्लेख के अनुसार ऋग्वेद काल में बसु नाम के प्रतापी राजा ने जब बांदा को अपनी राजधानी बनाया तो उन्होंने केन नदी के तट पर मां सिंहवाहिनी के दरबार की स्थापना कराई थी। वहीं द्वापर युग में अज्ञातवास के दौरान पांडवों के मां सिंहवाहिनी की आराधना करने के भी प्रमाण मिलते हैं। बताते हैं कि द्वापर युग में बांदा का पूर्व नाम विराटनगर था।

मंदिर के पुजारी बृजलाल श्रीमाली बताते हैं कि इतिहासकारों का मत है कि मंदिर की पुनर्स्थापना चंदेलवंश के राजाओं ने कराई थी। बताते हैं कि चंदेलवंश के राजा विद्याधर, कीर्तिमान, गुमान सिंह आदि अपनी राजधानी महोबा से कालिंजर जाते समय केन नदी के छुलछुलिया घाट से गुजरते थे और मां सिंहवाहिनी के दरबार में हाजिरी के बाद ही आगे बढ़ते थे।

वहीं त्रिपुरी के चेदिवंशीय राजा, मौर्य युग, गुप्तकाल और प्रतिहार राजाओं का भी मां सिंहवाहिनी मंदिर से ऐतिहासिक सरोकार का उल्लेख मिलता है। चंदेलवंश की पुत्री रानी दुर्गावती की वीरता को भी मां सिंहवाहिनी का वरदान प्राप्त था।

मां खुशियों से भरतीं हैं भक्तों की झोली

मां सिंहवाहिनी के पुरातन इतिहास और मां की महिमा को लेकर मंदिर समिति के प्रबंधक प्रद्युम्न कुमार लालू दुबे बताते हैं कि वास्तव में मां की महिमा अपरंपार है। मां सिंहवाहिनी के दरबार में भक्तों के मन की मुरादें पूरी होती हैं और भक्तों की झोली खुशियों से भरती है। बताते हैं कि नवरात्र के नौ दिनों तक मंदिर कमेटी की ओर से कन्या भोज का आयोजन किया जाता है, जिसमें मां के भक्त बढ़-चढ़कर हिस्सा लेते हैं। प्रबंधक लालू दुबे का कहना है कि इतिहासकारों का मत है कि यहां कभी पांडवों ने भी आकर मां सिंहवाहिनी की आराधना की थी।

औरैया: शारदीय नवरात्रि के पावन पर्व पर जनपद के विभिन्न कस्बा एवं ग्रामीण अंचलों में विभिन्न प्रकार अनुष्ठान किए जा रहे हैं। देवी स्तुति के लिए बनाए गये पंडालों में मां दुर्गा की मूर्ति स्थापित की गई है। इसके साथ ही मंदिरों पर दैनिक रूप से श्रद्धालु भक्तगणों द्वारा आराधना कर देवी की स्तुति करते हुए मन्नते मांगी जा रही हैं।

इसके अलावा देवी मंदिरों पर श्रीमद् भागवत कथा का भी आयोजन हो रहा है। जिले में महिलाओं एवं पुरुषों 9 दिन का उपवास रखा है। इस बीच कन्या पूजन भी किया जा रहा है। श्रद्धालु भक्तगणों ने अपने घरों पर जवारे भी बाए हुए हैं। इन जवारों को देवी मंदिरों पर सप्तमी से नवमी तक चढ़ाया जाएगा। देवी मंदिरों पर श्रद्धालु भक्तगण विभिन्न प्रकार के अनुष्ठान करते हुए देवी की स्तुति कर रहे हैं।

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