Allahabad High Court: अनुदान की शर्तों का उल्लंघन करने पर प्राधिकारी द्वारा पारित आदेश को चुनौती देना अनुचित
प्रयागराज। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अपने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा कि अनुदान की शर्तों का उल्लंघन करने पर संबंधित पक्षकार सक्षम प्राधिकारी द्वारा पारित आदेश को चुनौती नहीं दे सकते हैं। वर्तमान मामले में नि:संदेह विवादित भूमि इलाहाबाद विश्वविद्यालय की है और याची इसका उपयोग तब तक ही कर सकते थे, जब तक वे समझौते की शर्तों के अनुसार कार्य करते रहेंगे।
समझौते की शर्तों का उल्लंघन करने पर विश्वविद्यालय परिसर में उपलब्ध भूमि को 6 महीने के अंदर खाली करने का प्रावधान भी पूर्व सुनिश्चित है। उक्त आदेश न्यायमूर्ति महेश चंद्र त्रिपाठी और न्यायमूर्ति प्रशांत कुमार की खंडपीठ ने विज्ञान परिषद के महासचिव द्वारा दाखिल याचिका को खारिज करते हुए पारित किया।
गौरतलब है कि सोसायटी पंजीकरण अधिनियम, 1860 के तहत विज्ञान परिषद एक पंजीकृत सोसाइटी है जिसकी स्थापना 10 मार्च 1913 को मुइर सेंट्रल कॉलेज (वर्तमान में इलाहाबाद विश्वविद्यालय) के चार प्रसिद्ध विद्वानों द्वारा हिंदी में वैज्ञानिक गतिविधियों को विकसित करने के उद्देश्य से की गई थी, लेकिन वर्तमान में उक्त परिषद की भूमि का उपयोग परिषद के पदाधिकारियों द्वारा व्यावसायिक उद्देश्यों की पूर्ति के लिए किया जा रहा है।
मालूम हो कि पदाधिकारी ने परिषद की इमारत के एक हिस्से को वाणिज्यिक गतिविधियों के क्रियान्वयन के लिए किराए पर दे दिया था। विश्वविद्यालय की कार्यकारिणी समिति का आरोप है कि पदाधिकारियों को इसकी अनुमति नहीं दी गई थी और भविष्य में वे अन्य हिस्सों को भी किराए पर देने की मंशा बना रहे थे।
विश्वविद्यालय की ओर से याची संस्था को नोटिस भी जारी की गई जिसके जवाब में उन्होंने स्वीकार किया कि उनके द्वारा विवादित परिसर का प्रयोग व्यावसायिक उद्देश्यों के लिए किया गया है, लेकिन भविष्य में वे इसका उपयोग केवल शैक्षणिक उद्देश्यों के लिए ही करेंगे। अंत में कोर्ट ने याचियों द्वारा स्वीकृत तथ्य के आधार पर याचिका खारिज कर दी।
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