बरेली: लक्ष्य 26 हजार...सात माह में सिर्फ सात सौ श्रमिकों को 100 दिन का रोजगार
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अनुपम सिंह, बरेली। अफसरशाही को जिन गरीबों का फिलहाल कोई ख्याल नहीं है, कुछ समय बाद चुनावी माहौल में उनकी कीमत बढ़ने वाली है। वोट मांगने वाले जब गांव-गांव जाकर अपनी योजनाओं का हिसाब देंगे तभी शायद पता चलेगा कि उनके सोए रहने से गरीबों को रोजगार की गारंटी देने वाली सबसे बड़ी योजना मनरेगा का क्या हाल हुआ है। बदतर स्थिति की हद यह है कि इस साल 26 हजार श्रमिकों को सौ दिन का रोजगार देने के लक्ष्य के मुकाबले विकास विभाग के अफसर सिर्फ सात सौ को ही रोजगार दे पाए हैं।
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सिस्टम की कार्यप्रणाली और दावों में कितना बड़ा अंतर आ चुका है, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि साल के सात महीने गुजरने के बावजूद मनरेगा के तहत श्रमिकों को रोजगार देने का लक्ष्य तीन प्रतिशत भी पूरा नहीं हो पाया है। मनरेगा के तहत हर साल श्रमिकों को सौ दिन का रोजगार देने का लक्ष्य शासन की ओर से जारी किया जाता है।
वित्तीय वर्ष 2023-24 में शासन ने जिले को 26 हजार श्रमिकों को रोजगार देने का लक्ष्य दिया था। वित्तीय वर्ष के सात महीने गुजरने तक रोजगार देने का जो हाल है, उसे देखकर साफ है कि आर्थिक तौर पर समाज के सबसे निचले तबके को सहारा देने की गारंटी कही जाने वाली यह योजना भी अब दम तोड़ने लगी है।
वित्तीय वर्ष के चूंकि अब पांच ही महीने बचे हैं लिहाजा बड़ी चुनौती है कि अफसर बाकी 25 हजार सात सौ जॉब कार्ड धारकों को रोजगार कैसे देंगे। माना जा रहा है कि कम समय में लक्ष्य पूरा करने की कोशिश फर्जीवाड़ा भी बढ़ाएगी। पिछले कुछ समय में मनरेगा में फर्जीवाड़े की बड़े पैमाने पर हुई शिकायतें भी इसी ओर इशारा कर रही हैं।
अफसर कागजी खानापूरी से सरकार की महत्वाकांक्षी योजनाओं का लक्ष्य पूरा करने के किस कदर आदी हो चुके हैं, इसके भी कम उदाहरण नहीं हैं। ये इस बात से भी जाहिर है कि बारिश खत्म होने के महीने भर बाद भी अब तक मनरेगा के काम शुरू नहीं हुए हैं।
दिवाली भी काली... अब तक नहीं दिया सवा तीन करोड़ का बकाया
कथित रूप से रोजगार की गारंटी वाली मनरेगा श्रमिकों के लिए सबसे सस्ता रोजगार है। उन्हें प्रतिदिन के हिसाब से 230 रुपये की दिहाड़ी दी जाती है, जबकि निजी तौर पर मजदूरी करने वालों को चार सौ रुपये तक की दिहाड़ी मिलती है। कई दूसरे राज्यों में भी यूपी के मुकाबले ज्यादा दिहाड़ी दी जा रही है। इसके बावजूद मनरेगा श्रमिकों को समय से भुगतान भी नहीं किया जा रहा है।
जिले में 1.40 लाख मानव दिवसों का करीब 3.25 करोड़ रुपये का भुगतान अब तक अटका हुआ है। पिछले दिनों जिलाधिकारी रविंद्र कुमार ने बकाया भुगतान न करने पर अफसरों से जवाब भी मांगा था लेकिन इसके बावजूद श्रमिकों को पैसा नहीं मिला है। रोज कमाने खाने वाले इन लोगों के घर में चूल्हा जलना ही मुश्किल है, दिवाली में जेबें खाली होने से उनकी मायूसी और ज्यादा बढ़ रही है।
60 से 99 दिन काम करने वालों की मांगी सूची
डीसी मनरेगा माे. हसीब अंसारी ने सात महीने में सौ दिन का रोजगार देने की इस स्थिति पर सभी बीडीओ को सोमवार को आदेश जारी कर जल्द लक्ष्य पूरा कराने को कहा है। उन्होंने यह भी निर्देश दिया है कि बीडीओ 60 से लेकर 99 दिन तक मनरेगा में काम कर चुके श्रमिकों की सूची भी बनवाकर दें।
डीसी मनरेगा का तर्क... बरसात की वजह से नहीं हो पाते काम
सात महीने में 26 हजार के लक्ष्य की तुलना में सिर्फ सात सौ लोगों को रोजगार देने पर डीसी मनरेगा मोहम्मद हबीब अंसारी की सफाई है कि अप्रैल और मई में काम होने के बाद जून, जुलाई, अगस्त और सितंबर तक बारिश की वजह से काम नहीं हो पाते हैं। कम श्रमिकों को रोजगार दे पाने की यही वजह है। उन्होंने कहा कि वित्तीय वर्ष पूरा होने में अभी कई महीने बाकी हैं। रोजगार देने के लक्ष्य को समय से पूरा कर लिया जाएगा। उन्होंने यह दिलचस्प दावा भी किया कि मनरेगा के तहत रोजगार देने में प्रदेश भर में बरेली जिले की स्थिति बेहतर है।
केंद्रीय कृषि मंत्री कहते हैं... बारिश में भी नहीं रुकते मनरेगा के काम
केंद्रीय कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर ने कुछ समय पहले एक साक्षात्कार में दावा किया था कि देशभर में मनरेगा के तहत जो 264 काम होते हैं, उनमें से 162 कृषि से जुड़े हुए हैं जो बारिश में भी कराए जा सकते हैं। उन्होंने कहा था कि इनमें से कोई भी काम अगर बारिश के दौरान ग्रामीण क्षेत्रों में मांगा जाए तो राज्य ही नहीं, केंद्र सरकार भी मना नहीं कर सकती क्योंकि यह सरकारों की बाध्यता है। केंद्रीय कृषि मंत्री ने यह भी कहा था कि मनरेगा में पैसों की कोई कमी नहीं है। यह राज्य सरकारों की इच्छा पर है कि वे मनरेगा के तहत कितना काम कराती हैं।
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