अवैध संबंधों का आरोप सिद्ध करने के लिए स्पष्ट साक्ष्य होने आवश्यक : हाईकोर्ट 

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Edited By Amrit Vichar
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प्रयागराज, अमृत विचार। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने तलाक के एक मामले में अपने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा कि जीवनसाथी के अवैध संबंधों के आरोपों को अदालत की कल्पना पर छोड़ना उचित नहीं है। पक्षों को तथ्यात्मक रूप से एक-दूसरे के अवैध संबंधों का स्पष्टीकरण देना चाहिए। हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 13 ए के तहत रोहित चतुर्वेदी को न्यायिक अलगाव की डिक्री देते हुए न्यायमूर्ति सौमित्र दयाल सिंह और न्यायमूर्ति शिव शंकर प्रसाद की खंडपीठ ने कहा कि वैवाहिक संबंधों में छोटे-मोटे विवाद या घटनाओं को क्रूरता नहीं माना जा सकता है। अगर अदालतें ऐसी घटनाओं को क्रूरता के रूप में देखती है तो कई विवाह विघटन के खतरे में पड़ जाएंगे। 

दरअसल वर्ष 2013 में दंपति की शादी हुई। 1 साल तक साथ रहने के बाद दोनों अलग हो गए। अपीलकर्ता पति ने पत्नी पर क्रूरता का आरोप लगाते हुए तलाक की मांग की। इसके साथ ही अपीलकर्ता ने अपनी पत्नी पर उसके माता-पिता के साथ दुर्व्यवहार करने और भीड़ को अपीलकर्ता के खिलाफ भड़काकर उस पर हमला करने के लिए उकसाने का आरोप लगाया। इसके अलावा पत्नी ने दहेज मांगने का आरोप लगाते हुए पति के खिलाफ आपराधिक मामला भी दर्ज कराया था जबकि पत्नी ने यह आरोप लगाया कि अपीलकर्ता का उसकी भाभी के साथ अवैध संबंध था। अपर प्रधान न्यायाधीश, परिवार न्यायालय, गाजियाबाद ने हिंदू विवाह अधिनियम,1955 की धारा 13 ए के तहत अपीलकर्ता द्वारा शुरू किए गए तलाक के मामले की कार्यवाही को खारिज कर दिया था, जिसे हाईकोर्ट के समक्ष प्रथम अपील में चुनौती दी गई। 

कोर्ट ने अपनी महत्वपूर्ण टिप्पणी देते हुए कहा की भीड़ अपने आप अपीलकर्ता और उसके परिवार का पीछा नहीं कर सकती थी, फिर भी इस घटना को क्रूरता के रूप में परिभाषित नहीं किया जा सकता है। कोर्ट ने आगे माना कि जिला अदालत के समक्ष प्रस्तुत किए गए सीमित साक्ष्य के अनुसार पत्नी द्वारा लगाए गए क्रूरता के आरोप झूठे लगते हैं। इसके अलावा अपीलकर्ता और उसकी भाभी के बीच अवैध संबंध का अनुमान केवल इस तथ्य के आधार पर नहीं लगाया जा सकता कि वह उस कमरे में सोता था, जिसमें उसकी भाभी अपने बच्चों के साथ सोती थी। अवैध संबंध का आरोप सिद्ध करने के लिए स्पष्ट साक्ष्य होने आवश्यक हैं। अंत में कोर्ट ने दोनों पक्षों के बीच वैवाहिक संबंध एवं सौहार्द के अभाव में अपीलकर्ता को न्यायिक अलगाव का आदेश दे दिया।

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